दिल्ली विधानसभा चुनावः आप को सुविधाओं का सहारा, भाजपा ने प्रचार में बाजी मारी
मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त इलाज, बुजुर्गों के लिए मुफ्त तीर्थ यात्रा और महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा। अरविंद केजरीवाल की इस 'मुफ्त सरकार' को दोबारा चुनकर आने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन पिछले दस दिनों में दिल्ली का सियासी माहौल कुछ बदला सा दिख रहा है। अब आप भाजपा से एक कड़ी चुनौती का सामना कर रही है।
इसकी एक वजह भारतीय जनता पार्टी का आक्रामक चुनाव प्रचार तो है ही, वहीं दूसरी ओर अपनी पार्टी में भी केजरीवाल अकेले पड़ते नजर आ रहे हैं। खासतौर पर पिछले चुनाव में उनके सहयोगी रहे अधिकतर बड़े नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं। यही नहीं बल्कि हर गली मोहल्ले में आम आदमी पार्टी की टोपी पहने दिखने वाले उनके वालंटियर भी इस बार किसी हद तक नदारद हैं।
इससे पहले हर चुनाव में आप के वालंटियर पूरे देश से दिल्ली आते थे और हर सड़क, हर गली, हर बस स्टॉप और मेट्रो स्टेशन पर सिर्फ आप की टोपी लगाए लोग ही दिखाई देते थे। इससे आम आदमी पार्टी के पक्ष में एक माहौल बन जाता था। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के दिनों से शुरू होकर यह माहौल पिछले विधानसभा चुनाव तक रहा।
लेकिन इस बीच एक-एक कर केजरीवाल के अधिकतर वरिष्ठ सहयोगी उनका साथ छोड़ गए। चाहे वे कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व न्यायधीश जस्टिस संतोष हेगडे हों, एडमिरल रामदास, पत्रकार आशुतोष, सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण, कवि कुमार विश्वास, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, मेधा पाटकर, मुंबई के मयंक गांधी, प्रीति शर्मा मेनन या अंजलि दमानिया सभी ने पार्टी छोड़ने की वजह आप में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव और केजरीवाल का तानाशाही व्यवहार बताई। वे अपने सहयोगियों के साथ भी कई बार बहुत कठोर और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं।
केजरीवाल के एक पूर्व सहयोगी का कहना है कि वे आम आदमी पार्टी में व्यवस्था परिवर्तन के लिए शामिल हुए थे। लेकिन जब उन्होंने पाया कि पार्टी तो खुद ही व्यवस्था का हिस्सा बन गई और दूसरी पार्टियों के सभी गुण और अवगुण उसमें आ गए तो इससे उनका मोहभंग हो गया।
पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने हाल ही में कहा कि पिछले चुनाव में 70 में से 67 सीटें जीतने के बाद अरविंद केजरीवाल मानो मदांध हो गए थे। वे चाहते थे हर काम उनकी मर्जी से हो।