महिला पत्रकार से छेड़खानी और मुकाबले की कहानी
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'आखिर ये लड़की झूठ क्यों बोलेगी? ये तो खुद को ही मुसीबत में डाल रही है।' मेरे मुंह पर पुलिस अधिकारी ने क्रिमिनल से यह बात कही।
शनिवार का दिन था। मैं गुड़गांव में अपने दोस्त के घर से दोपहर का खाना खाकर घर जा रही थी।
दिल्ली में ट्रैफिक से बचने के लिए लोग मेट्रो का सहारा लेते हैं। मैंने भी वैसा ही किया। ट्रेन खचाखच भरी थी। लेडीज अपार्टमेंट में चढ़ने की बजाए मैंने सामान्य कोच में चढ़ने का फैसला किया। लेकिन मुझे क्या पता था कि इस भीड़ की आड़ में इतने शर्मनाक क्राइम का शिकार होने वाली हूं।
राजीव चौक पर उतर कर मुझे ट्रेन बदलनी थी। दरवाजा खुलते ही लोगों का सैलाब ट्रेन के बाहर निकला। बहुत जतन करने के बाद भी मैं बाहर नहीं निकल सकी।
मेघा विश्वनाथ टीवी 18 में रिपोर्टर हैं। ये अनुभव उन्होंने 'ब्लॉग ड्रॉप ऑफ रेन' में लिखा है।
वह अपने दोनों हाथ से कुछ छुपा रहा था
मैंने अगले स्टेशन, नई दिल्ली पर उतरने का फैसला किया। मैं दरवाजे की तरफ बढ़ना चाहती थी। लेकिन तभी मैंने कुछ चुभता हुआ महसूस किया।
मेरे शरीर के पिछले हिस्से में कमर के नीचे कुछ चुभ रहा था। मैं ट्रेन से उतरने की जल्दी में थी। मुझे लगा कि शायद किसी का बैग होगा या भीड़ की वजह से किसी का हाथ लगा होगा।
मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो लंबी सफेद शर्ट पहने एक शख्स लगातार मुझे घूर रहा था। उसके हाथ में कोई सामान भी नहीं था। वह अपने दोनों हाथों से कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा था।
मुझे उस पर शक हुआ। मैंने नीचे देखा तो उसकी पैंट का जिप खुला हुआ था। यह देखते ही मेरे आंख में खून उतर आया।
उस एक सेकेंड में मेरे सामने उन तमाम लोगों के चेहरे घूम गए जो छेड़खानी की हरकतों में पकड़े जा चुके थे।
'उसके पैंट की जिप खुली हुई थी'
इससे पहले मैं कुछ समझती मैं अचानक चिल्ला पड़ी,
'क्या प्रॉब्लम है?'
'क्या समझ रखा है साले?'
'हिम्मत कैसे हुई तेरी?'
उसकी आंख में देखते हुए मैंने ये सब कहा। उसने मुझसे माफी मांगना शुरु कर दी और कहने लगा कि असल में उसका हाथ मेरे शरीर से टकरा रहा था।
'अच्छा तेरा हाथ जो तेरे पैंट से बाहर निकल आया, फिर तेरे पैंट की चेन कैसे खुली।'
मैं जोर-जोर से चिल्ला रही थी। कोच में भीड़ थी लेकिन कोई भी मेरी मदद के लिए आगे नहीं आया। मैंने मुड़कर देखा तो दो लड़के मुझ पर हंस रहे थे। यह सब देखने के बाद मेरे सब्र का बांध टूट गया।
मेट्रो गार्ड ने भी नहीं की मदद
मैंने उस आदमी का कॉलर पकड़ा और खींच कर ट्रेन के बाहर ले आई। लेकिन वह मेरी पकड़ छुड़ा भागने लगा। मैंने देखा कि लोग मेरी ओर देख रहे हैं लेकिन, अभी भी किसी ने मेरी मदद नहीं की।
मैं उसके पीछे दौड़ी और उसे पकड़ लिया। स्टेशन पर मैं जोर-जोर से चिल्ला रही थी। लोगों के अलावा मेट्रो में लगे गार्ड ने भी मुझे उस आदमी को पकड़ते हुए देखा। लेकिन उन्होंने भी मेरी मदद नहीं की।
मैंने किसी तरह उसे पकड़ा और पुलिस कंट्रोल रूम ले गई। यहां भी उसने वही बात कही कि, मेरा हाथ गलती से उन्हें लग गया क्योंकि मेट्रो में बहुत भीड़ थी।
तब तक वहां भीड़ जमा हो चुकी थी और सभी मुझे घूर रहे थे। फिर भी मैं चिल्लाई कि इसका शर्ट उठाइए अभी आपको पता चल जाएगा कि मुझे क्या चीज टच कर रही थी।
लड़कियों को खुद करनी होगी अपनी मदद
गार्ड ने मुझसे कहा 'आखिर ये लड़की झूठ क्यों बोलेगी? ये तो खुद को ही मुसीबत में डाल रही है।' मैं चौंक गई। अपराधी मेरे सामने खड़ा था और पुलिस वाला मुझे ही शर्म की निगाह से देख रहा था।
मैंने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया और कश्मीरी गेट पुलिस स्टेशन गई। उसके खिलाफ छेड़खानी का केस दर्ज कराया। उसे तुरंत ही गिरफ्तार किया गया और जेल में डाल दिया गया।
लेकिन इस मामले को मैंने यहीं नहीं छोड़ा। सोमवार को मैं मैजिस्ट्रेट के सामने पेश हुई और अपना बयान भी दर्ज कराया। दोषी फिलहाल तिहाड़ जेल में है।
इस पूरे मामले में मुझे एक ही बात समझ में आई कि जब तक लड़कियां खुद अपनी लड़ाई नहीं लड़ेंगी कोई उनकी मदद नहीं कर सकता।
साभार: Drop of Rain