जम्मू बाढ: इन मजदूरों ने बचा लीं हजारों जानें
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जम्मू-कश्मीर में बाढ़ पीड़ितों को बचाने में जुटे सैनिकों की कहानियां तो सुनने को मिल रही हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी मजदूर हैं जो अपनी जान को जोखिम में डालकर कश्मीर स्थित नूर बाग इलाके के हजारों परिवार को तबाह होने से बचाकर वहां से वापस हो रहे हैं।
मंगलवार को गोपालगंज, बिहार का एक और उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के 16 और मजदूर श्रीनगर से नई दिल्ली सकुशल लौटे। देर शाम उन्हें वैशाली एक्सप्रेस से गोरखपुर भेज दिया गया। ये कामगार करीब 30 किलोमीटर पैदल चलकर जम्मू स्थित एयरपोर्ट पहुंचे। वहां से एयर इंडिया की फ्लाइट से मंगलवार को दिल्ली पहुंचे।
बांध टूटा, मजदूरों का सब्र नहीं
कुशीनगर के रहने वाले उमेश चौहान ने बताया कि 7 सितंबर की रात करीब 11:00 बजे मस्जिद से ऐलान किया गया कि नूर बाग की तरफ बना झेलम का बांध टूटने वाला है।
इतना सुनते ही पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई, लेकिन झेलम तट पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने में जुटे कुशीनगर के मजदूरों सहित करीब 80 मजदूर सक्रिय हो गए। वे वहां से भागे नहीं, बल्कि सभी टूट रहे बांध को रोकने में जुट गए।
उमेश ने बताया कि मजदूरों ने मिलकर प्लांट में इस्तेमाल होने वाली 4,000 सीमेंट और रेत की बोरियां टूट रहे बांध के सपोर्ट में रख दीं और बोरियों को लोहे की प्लेट से घेर दिया। इसी दौरान पता चला कि झेलम का दूसरा बांध टूट गया है। इसका फायदा यह हुआ कि टूट रहे बांध से पानी का दबाव कम हो गया।
...और इस तरह बचा नूर बाग
कुशीनगर के धुरिया इमिलिया गांव के रहने वाले राम आशीष ने बताया कि नूर बाग के दूसरी तरफ का बांध टूटने से उधर का पूरा इलाका जलमग्न हो गया, लेकिन नूर बाग और कमर बाग का इलाका बचा रहा। हालांकि दूसरी तरफ का पानी भी नूर बाग की तरफ आने लगा, लेकिन इतना मौका मिल गया कि लोग वहां से निकल सकें।
स्थानीय लोगों ने भी की मदद
विष्णुपुरा के रहने वाले संत कुमार आर्य और जीवन चौहान ने बताया कि बांध टूटने की खबर से पहले तो सभी मजदूर डर गए, लेकिन थोड़ी देर में स्थानीय लोग भी मदद के लिए पहुंच गए।
रातोंरात सीवर ट्रीटमेंट प्लांट में काम करने वाले मजदूर टूटते हुए बांध को रोकने में कामयाब रहे। इनकी यह भी शिकायत है कि स्थानीय लोग अपनी जान बचाने के लिए तो साथ दे रहे थे, लेकिन कई इलाकों में पथराव भी कर रहे थे।