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1997 कनॉट प्लेस शूट आउट: काश...गोलीबारी में नहीं फंसता तो अलग ही होता जीवन, कोर्ट ने दिए 15 लाख रुपये देने के आदेश

Sun, 01 May 2022 12:05 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: शाहरुख खान Updated Sun, 01 May 2022 12:05 PM IST
सार

तरुण प्रीत सिंह को 1997 के वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन याद आते हैं उन्होंने कहा कि कनॉट प्लेस पर गोलीबारी में नहीं फंसता तो अलग ही जीवन होता। उनके सिर में लगे छर्रे व दाहिने हाथ में मामूली दिव्यांगता प्रीत को उस काले दिन की निरंतर याद दिलाती है
न्यायालय ने आठ फीसदी प्रतिवर्ष की ब्याज के साथ 15 लाख रुपये देने के आदेश दिए हैं।  

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1997 Connaught Place Shootout Life would have been different if I hadnt been caught in a shootout at Connaught Place
फाइल फोटो

विस्तार

समय-समय पर तरुण प्रीत सिंह को 1997 के वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन याद आते हैं, जब मध्य दिल्ली के कनॉट प्लेस में पुलिस मुठभेड़ में उन्हें मौत के घाट उतारने की कोशिश हुई थी। इस घटना में उन्होंने अपने दो दोस्तों को खो दिया था। वह उस समय अपने शुरुआती 20 के दशक में थे, जब उन्हें सात बार गोली मारी गई। 
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उनकी सर्जरी हुई और अगले पांच साल उन्हें अपनी चोटों से उबरने लगे। इस वजह से मजबूरन उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। अब 25 साल बाद उसके सिर में एक छर्रे और उसके दाहिने हाथ में मामूली दिव्यांगता उस  काले दिन की निरंतर याद दिलाती है। उन्होंने बताया कि वह अपने जीवन के साथ बहुत कुछ कर सकते थे। 
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अगर वह गोलीबारी में नहीं फंसते। उनका जीवन पूरी तरह से अलग होता। उनकी चोटों के बाद के प्रभाव उन्हें सामान्य जीवन जीने से रोकते हैं। उन्हें अक्सर सिरदर्द होता है और सर्दियों में विशेष रूप से परेशानी होती है। उन्होंने कहा कि वह एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश करते हैं, लेकिन, चोटों ने उन्हें ऐसा कभी नहीं करने दिया। 
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इस वजह से वह न तो भारी काम कर सकते हैं और न ही तनाव ले सकते हैं। वर्तमान में दो बच्चों के पिता प्रीत एक कपड़े की दुकान में काम करते हैं और प्रति माह केवल आठ हजार रुपये कमाते हैं। परिवार का खर्च चलाने के लिए उनकी पत्नी भी एक स्थानीय अस्पताल में काम करतीं हैं और प्रति माह तीन हजार रुपये कमातीं हैं।

परिवार किराए के मकान में रहता है। प्रीत और उनके दो दोस्त 31 मार्च 1997 को एक कार में यात्रा कर रहे थे। इस दौरान वे कनॉट प्लेस के पास बाराखंभा रोड पर रुके थे। इस बीच उनके दोस्त दिल्ली पुलिस की अंधाधुंध गोलीबारी की चपेट में आ गए, जबकि, वह बच गए। दोस्तों की मौके पर ही मौत हो गई थी। 

बाद में 10 पुलिस अधिकारियों को आपराधिक मामले में दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। हाल ही में प्रीत और उनके परिवार के लिए उम्मीद की किरण दिखाई दी है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 26 अप्रैल के एक आदेश में केंद्र को गोलीबारी की तारीख से प्रीत को आठ फीसदी प्रति वर्ष के ब्याज के साथ 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। 

अदालत ने उन्हें मुकदमे की लागत के रूप में दो लाख रुपये की राशि भी प्रदान की। हालांकि, उन्होंने दिसंबर 1998 में याचिका दायर कर कानून लागू करने वाली एजेंसी के कृत्यों और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के उल्लंघन के लिए एक करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी।
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