World Environment Day: अब भी न चेते तो विनाश तय, चिंतन करने पर मजबूर करेंगी पर्यावरणविदों की कहीं बातें
देश के पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तराखंड का जैव विविधता संसार अपने आप में बेहद समृद्ध है। अब इसी समृद्ध विरासत को राज्य की जरूरतों से जोड़ने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
इस दौरान डीजीपी अशोक कुमार ने भी पर्यावरण के प्रति पुलिस के प्रयासों की जानकारी दी। डॉ. जोशी ने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस 2022 की थीम ओनली वन अर्थ की तर्ज पर हम सभी को इसके संरक्षण के लिए आगे आने की जरूरत है। ग्रामीण आर्थिकी को बढ़ावा देने, जल संचयन और पर्यावरण संरक्षण के लिए भी उन्होंने कई सुझाव दिए। इसके साथ ही जीडीपी के बजाय जीईपी (ग्रॉस एनवायरमेंट प्रोडक्ट) पर जोर देने को कहा।
डीजीपी अशोक कुमार ने पुलिस के प्रयासों के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि पिछले साल पुलिस ने प्रदेशभर में एक लाख से अधिक पौधे रोपे थे। ऑपरेशन मर्यादा भी पर्यावरण संरक्षण की ओर बढ़ाया हुआ कदम है। तीर्थ स्थानों पर जो लोग गंदगी फैलाते हैं, उनके खिलाफ सख्ती की जा रही है। ध्वनि प्रदूषण कम हो इसके लिए वाहनों पर ट्रैफिक पुलिस कार्रवाई कर रही है। कहा कि यह संतुलन कुछ हद तक गांवों में ही बचा है। शहरों में प्रकृति कंक्रीट के बीच कहीं खो गई है।
राज्य की जैव विविधता को जरूरत से जोड़ने की आवश्यकता
देश के पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तराखंड का जैव विविधता संसार अपने आप में बेहद समृद्ध है। अब इसी समृद्ध विरासत को राज्य की जरूरतों से जोड़ने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। जानकारों का मानना है कि 70 प्रतिशत से अधिक वनभूमि वाले इस राज्य में संसाधनों को उत्पादन से जोड़ना होगा। इसके लिए इंटीग्रेटेड ईको सिस्टम रेस्टोरेशन की बात कही जा रही है ताकि विकास के सूचक को सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) बनाया जा सके और आर्थिकी व पारिस्थितिकी के बीच समन्वय बनाकर आगे बढ़ा जा सके।
उत्तराखंड गठन के बाद वन परिक्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन अब तक हम वनों को आजीविका से नहीं जोड़ पाए हैं। बेहद सीमित आर्थिक संसाधनों वाले इस प्रदेश में वनों को आजीविका से जोड़ने की बात तो कही जाती है, लेकिन अभी तक इस पर कोई भी सरकार एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार नहीं कर पाई है। पिछले दिनों मुख्य सचिव डॉ. एसएस संधु ने वनों, पर्यटक स्थलों के आसपास वॉकिंग और साइकिलिंग ट्रैक विकसित करने के निर्देश दिए।
बुग्यालों के संरक्षण के साथ पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा दिए जाने की संभावनाएं भी तलाशने को कहा ताकि ईको टूरिज्म और और एडवेंचर टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा सके। बीते दिनों आसन झील सहित प्रदेेश में चिन्हित की गई करीब एक हजार आर्द्र भूमि या वेटलैंड को भी संवारने की बात कही गई। बर्ड वॉचिंग, नेचर टूरिज्म के साथ विलेज टूरिज्म को भी बढ़ावा देने की बात कही जा रही है लेकिन कवायद वहीं आकर रुक जाती है, जब इसकी रूपरेखा को धरातल पर उतराने की बारी आती है।
जैव विविधता से आर्थिकी को जोड़ते हुए पर्यटन को आगे बढ़ाने लिए तमाम महकमों में सामंजस्य जरूरी है, जिसका फिलहाल प्रदेश में अभाव दिखाई देता है। पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी कहते हैं कि हमारे सभी संसाधन एक-दूसरे से जुड़े हैं, जब हम इनसे लाभ की बात करते हैं, तो इसके लिए जरूरी हो जाता है कि हम जैव विविधता को संरक्षित करते हुए इस दिशा में आगे बढ़ें।
पर्यावरणविदों का कहना
राज्य का दुर्भाग्य है कि यहां जल, जंगल, जमीन, परिवहन और तकनीक, जो भी जनसामान्य और पर्यावरण से जुड़े विभाग हैं, किसी में आपस में सामंजस्य नहीं है। इसलिए हम जैव विविधता समृद्ध इस प्रदेश में इंट्रीग्रेटेड ईको रेस्टोरेशन की बात कर रहे हैं ताकि जीडीपी के साथ सकल पर्यावरण उत्पाद की भी पैरवी कर संतुलित विकास किया जा सके। ऐसा विकास, जिससे आर्थिकी भी मजबूत हो और पर्यावरण भी। इस सवाल पर सरकारों को जगाने के लिए हम पूरी कोशिश कर रहे हैं ताकि नीति-निर्धारक इस दिशा में गंभीरता से चिंतन कर ठोस पहल करें।
- पद्मविभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद एवं हेस्को प्रमुख
ये भी पढ़ें...Yogi Adityanath Birthday: महाराज का ये अंदाज है बिल्कुल जुदा, बेहद खास है मां के साथ बिताए पलों की तस्वीरें
प्रदेश में जैव विविधता की विरासत को बचाए रखते हुए इससे कैसे लाभ लिया जा सकता है, इस पर तमाम बिंदुओं पर चर्चा किए जाने की जरूरत है। इसके लिए भविष्य को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनानी होंगी। उत्तराखंड देश का अकेला ऐसा राज्य है, जहां वन पंचायतों का गठन किया गया है। यहां 12,167 वन पंचायतें हैं। इन्हें जैव विविधता से जोड़कर इनकी आर्थिकी को मजबूत बनाया जा सकता है लेकिन इसके उपयोग, प्रबंधन और सुरक्षा के नियमों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- राजीव भरतरी, अध्यक्ष, उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड