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जनता के मुद्दों के बगैर एक और चुनाव
राकेश खंडूड़ी / अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 09 Mar 2017 11:51 AM IST
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कर्णप्रयाग विधानसभा में बृहस्पतिवार को मतदान के साथ ही प्रदेश की सभी 70 सीटों पर चुनाव संपन्न हो जाएगा।
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इस तरह यह राज्य एक बार ऐसे विधानसभा चुनाव का गवाह बनेगा जिसमें जनता के सवाल चुनावी मुद्दे नहीं बन पाए। ऐसा नहीं कि प्रदेश में मुद्दों की कोई कमी थी, मगर दागी और बागी के मुद्दे ने जनसरोकारों से जुड़े इन सवालों को नेपथ्य पर धकेल दिया।
वर्ष 2002 में पहली निर्वाचित सरकार के लिए चुनाव हुआ तो सियासी दलों के पास कोई खास मुद्दे नहीं थे। कांग्रेस ने भाजपा की अंतरिम सरकार में हुए कथित घोटालों को लेकर चुनाव में मुद्दा बनाया। सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस भूल गई कि उसने चुनावों घोटाले का कोई मुद्दा उठाया था।
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वर्ष 2007 में विधानसभा के चुनाव हुए। इस बार भी चुनाव से जनता के मुद्दे गायब थे। भाजपा ने लालबत्ती और कांग्रेस राज के 56 घोटालों का मुद्दा बनाया, जबकि ढांचागत सुविधाओं, रोजगार, पर्यटन और ऊर्जा के क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदेश के लोग सत्ता की दावेदारी करने वाले दलों से आस लगाए बैठे थे। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनीं, मगर न तो 56 घोटालों के आरोपियों को सजा दिला सकी न ही खुद को लालबत्ती के मोह से दूर रख पाई।
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राज्य आंदोलन की अवधारणा से जुड़े सवालों की एक बार फिर अनदेखी हुई। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव भी भाजपा राज में हुए कथित महाकुंभ और स्टर्डिया घोटाले, पन बिजली परियोजनाओं के आवंटन और दवा घोटालों पर लड़ा गया। फिर से सड़क, पानी, बिजली, रोजगार और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे चुनाव से गायब रहे। जिन घोटालों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा उनकी जांच पर करोड़ों रुपये लुटाने के अलावा उसने कुछ नहीं किया।
पिछले पांच साल के दौरान प्रदेश के सामने कई नई तरह की चुनौतियां सामने आई। वर्ष 2013 में भीषण दैवीय आपदा के बाद प्रदेश की जनता इन चुनाव में यह उम्मीद कर रही थी कि सैकड़ों गांवों के पुनर्वास, रोजगार, पलायन और उजाड़ होती खेती से जुड़े मुद्दे गरमाएंगे। मगर एक बार फिर जनता ठगी रह गई और पूरा चुनाव दागी-बागी पर सिमट गया। इस तरह ये राज्य बगैर जनमुद्दों के चुनाव का एक फिर साक्षी बना।
आर या पार, किसका उद्धार
विधानसभा चुनाव परिणाम की घड़ी बेहद करीब आ गई है। इसके साथ ही उम्मीदवारों का दिल भी धक-धक करने लगा है। दो दिन बाद उम्मीदवारों से लेकर राज्य के लोगों तक को पता चल जाएगा कि प्रदेश में किस दल या गठबंधन की सरकार बनेगी। सियासी हलकों में सवाल तैर रहे हैं। क्या इस बार आर या पार होगा या फिर निर्दलियों का उद्धार होगा?
637 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होना है
विधानसभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस, बसपा समेत कुल छह राष्ट्रीय दलों, चार क्षेत्रीय व 24 गैरमान्यता प्राप्त दलों के कुल 637 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला होना है। इनमें से 261 निर्दलीय प्रत्याशी हैं।