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उत्तराखंड: जंगलों की आग को लेकर पदमभूषण डॉ. अनिल जोशी चिंतित, प्रधानमंत्री को लिखा पत्र 

Mon, 12 Apr 2021 11:13 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 12 Apr 2021 11:13 PM IST
सार

  • वनों की आग से चिंतित पदमभूषण डॉ. अनिल जोशी ने लिखा पत्र

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Uttarakhand Wildfire News: Padmabhushan Dr. Anil Joshi Wrote Letter to PM Narendra Modi
पदमभूषण अनिल प्रकाश जोशी - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

हिमालयी वनों में आग की बढ़ती घटनाओं से चिंतित व व्यथित पर्यावरणविद व हैस्को के संस्थापक पदमभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने वन नीति की वर्तमान चिंताओं के आलोक में समीक्षा की वकालत की है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर अनुरोध किया है कि वह वन नीति के पुनर्वालोकन के लिए निर्देश जारी करें। जोशी ने कहा कि देश की हवा, पानी और मिट्टी में हिमालयी वनों का प्रमुख योगदान है, इसलिए यह सामूहिक जुड़ाव और संकल्पों के साथ समाधान तलाशे जाने की आवश्यकता समय है। 

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उन्होंने लिखा, वनों की आग पिछले लगातार दो दशकों से हिमालय के वनों को भारी क्षति पहुंचा रही है इसके मूल कारणों में जलवायु परिवर्तन, समय पर वर्षा व साधनों का अभाव रहे हैं। हिमालय के वनों की क्षति राष्ट्रीय क्षति के रूप में समझी जानी चाहिए। 1988 की वन नीति के पुनर्वालोकन की आवश्यकता का भी समय आ चुका है। यह वन नीति वनों की सुरक्षा व प्रबंधन के लिए समर्पित की गई थी।
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अगर 1988 की वन नीति, वनों के पर्याप्त विस्तार प्रबंधन करने में असफल रही हो तो इसके कारणों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। इस नीति के अनुसार उत्तराखंड में 33 प्रतिशत वन होने चाहिए व पहाड़ों में 65 प्रतिशत। क्या हम इस नीति से इन लक्ष्यों तक पहुंच पाए? क्या गत 33 वर्षों में यह नीति वनों को बेहतर कर पाई? या आग फैलने की घटनाओं को रोक पाई? नीति में इस तरह के सवालों पर चिंता का समय है।
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सामुदायिक भागीदारी एक गंभीर विषय
वनों की आग के प्रति गांवोंकी सामुदायिक भागीदारी एक गंभीर विषय बन चुका है। एक समय गांव के गांव सामूहिक रूप से इस दावानल से लड़कर जीत जाते थे, लेकिन आज भागीदारी के अभाव में यह दावानल हजारों हैक्टेयर वनों को भारी क्षति पहुंचा रहा है। 

ये हालात देश को एक बड़े संकट में धकेल देंगे
उन्होंने लिखा कि वन, जल, मिट्टी व वायु के स्रोत हैं, इनके घटते-मरते हालात देश को एक बड़े संकट की ओर धकेल देंगे। देश के पानी, हवा, मिट्टी की आवश्यकता हिमालयी वनों से जुड़ी हुई है। इसलिये इनकी सुरक्षा हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

12 हजार वन पंचायतों में उत्साह नहीं
दूसरी तरफ वन पंचायतों का गठन आज मात्र एक औपचारिकता ही प्रतीत होती है क्योंकि, उनके वर्तमान दायित्व और अधिकार उन्हें वनों के संरक्षण के प्रति प्रेरित भी नहीं करते है। इन वन पंचायतों को तर्ज व शैली में पर्याप्त प्रोत्साहन देकर गांवों के हर दर्जे के वनों के रखरखाव के लिए भी जोड़ा जा सकता है। अकेले उत्तराखंड में 12 हजार से ज्यादा वन पंचायतें हैं, पर उनकी समुचित उपयोग वन प्रबंधन में भागीदारी उत्साहपूर्ण नहीं है।


हिमालयी शोध संस्थानों को आगे आना होगा
वनों में लगने वाली आग पतझड़ व खरपतवर आग फैलने में भूमिका बड़े कारणों में से एक है। पूर्व में गांव इन पत्तियों से मवेशियों के लिए बिछौना बना कर उसका उपयोग खाद बनाने में करते थे। नए ज्ञान-विज्ञान के अभाव में यह परंपरा आगे नहीं बढ़ सकी। यह भी एक बड़ी संपदा है जिसका कई तरह से उपयोग संभव है। इससे स्थानीय रोजगार भी पनपेंगें। हिमालयी शोध संस्थानों को इस ओर गंभीरता दिखानी चाहिए।

चीड़ से नुकसान, चाल-खाल की सुध नहीं
डॉ. जोशी के मुताबिक, चीड़ के वनों की बहुतायत जोकि, मूल रूप से स्थानीय नहीं हैं। यह आग को भड़काने में सहयोगी है। इन वनों के पारिस्थितिकीय परिवर्तन आज एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुकी है। क्या इन वनों के बीच वर्षा जलछिद्र व जल कुंड बनाकर पारिस्थितिकी, परिवर्तन संभव है? आज हिमालय के चाल-खाल, ताल भी हर तरह के रख रखाव से दूर हो चुके है क्योंकि गांव इस तरह के अधिकारों से वंचित कर दिए गए हैं।

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