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उत्तराखंड मौसम: बदरीनाथ धाम समेत ऊंची चोटियों पर बर्फबारी, मैदान में ठंडी हवाओं ने दी गर्मी से राहत

Tue, 20 Apr 2021 06:40 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 20 Apr 2021 06:40 PM IST
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Uttarakhand Weather Update Today: Cold Wave Gives Relief from Hot Weather
बदरीनाथ में बर्फबारी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

उत्तराखंड में मंगलवार को मौसम ने करवट बदली। राजधानी देहरादून समेत प्रदेश के कई इलाकों में सुबह से ही बादल छाए हैं। गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक मौसम में ठंडक महसूस होने से लोगों को उमस और गर्मी से राहत मिली। हरिद्वार में पारा करीब सात डिग्री तक लुढ़क गया है।

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बदरीनाथ धाम, रुद्रनाथ में बर्फबारी, जोशीमठ में हुई बारिश
 मंगलवार को बदरीनाथ धाम, रुद्रनाथ समेत चमोली जिले के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी हुई, जबकि जोशीमठ क्षेत्र में बारिश हुई, जिससे मौसम में ठंडक आ गई है। बर्फबारी से हेमकुंड साहिब के आस्था पथ से बर्फ हटाने का काम भी बार-बार प्रभावित हो रहा है। सोमवार को मौसम साफ होने के बाद बर्फ हटाने का काम शुरू हुआ था, लेकिन मंगलवार को दोपहर बाद फिर बर्फबारी होने से काम रुक गया।
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उत्तराखंड : बदरी-केदार, हेमकुंड के साथ ही ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हुई बर्फबारी, लौटी ठंड, तस्वीरों में देखें
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गुरुद्वारा प्रबंधक सरदार सेवा सिंह का कहना है कि हेमकुंड साहिब क्षेत्र में दोपहर बाद बर्फबारी होने से यात्रा मार्ग खोलने में दिक्कतें आ रही हैं। मार्ग खोलने के लिए 418 इंजीनियरिंग कोर के 19 जवान इन दिनों हेमकुंड यात्रा मार्ग से बर्फ हटाने का काम कर रहे हैं। वहीं, बदरीनाथ धाम, रुद्रनाथ, लाल माटी समेत ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दोपहर बाद बर्फबारी हुई, जो देर शाम तक होती रही। 

मौसम की बेरुखी से सूख रहे धारे और जलकुंड

रुद्रप्रयाग के गांवों में बीते वर्षों तक बारह महीने पानी से लबालब रहने वाले पौराणिक नौले, धारे व जलकुंड बढ़ती गर्मी और बारिश कम होने के कारण सूखने लगे हैं। जबकि राजमार्गों व संपर्क मार्गों पर भी पड़ने वाले कई स्रोत सूख चुके हैं।

बीते वर्ष बरसात के बाद अभी तक सामान्य से 87 फीसदी कम बारिश हुई है, उससे भूजल का स्तर काफी कम हो गया है, जिसका असर प्राकृतिक नौले, धारों व जलकुंडों पर पड़ा है। ग्राम पंचायत नवासू में गडोणी व सुरजीग पौराणिक जलस्रोत सूखने के कगार पर पहुंच चुके हैं। वहीं, पणाधारा, कलेथ, बाड़ा और सिल्ला गांव के पौराणिक स्रोतों में पानी नामात्र रह गया है। रुद्रप्रयाग के गुलाबराय सहित तल्लानागपुर के भट्टगांव में पौराणिक धारा सहित घोलतीर, मवाणा, भटवाड़ी का प्राकृतिक जलस्रोत मौसम की बेरुखी से सूखते जा रहे हैं। पर्यावरण प्रेमी शिक्षक सत्येंद्र सिंह भंडारी का कहना है कि मौसम की बेरुखी के कारण भी और गांवों से नगरीय क्षेत्रों में पौराणिक जलस्रोतों के संरक्षण व सौंदर्यीकरण में सिमेंट व टाइल्स का प्रयोग हो रहा है। इस तकनीक से जहां भूमिगत जल के स्राव पर असर पड़ रहा है। वहीं बारिश का पानी जमीन में नहीं पहुंच रहा है, जिससे भूजल का स्तर तेजी से घट रहा है।

आमजन को जल संसाधनों की महत्ता व अपनी जरूरत को ध्यान में रखते हुए दीर्घकाल के लिए इनका पारंपरिक तरीके से संरक्षण व संवर्धन करना होगा। पौराणिक जलस्रोतों के आसपास पौधारोपण कर उसकी देखरेख कर जंगल विकसित करने होंगे, जिससे पानी संरक्षित हो सके।
- सच्चिदानंद भारती, प्रणेता पाणी राखो आंदोलन, उत्तराखंड।

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