उत्तराखंड : मैदान की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं पहाड़, पहली स्टेट ऑफ एनवायरमेंट रिपोर्ट में जताई चिंता
- ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, नदियों में कम हो रहा है पानी, बड़े बांधों पर सवाल
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प्रदेश में मैदान की तुलना में पहाड़ अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं और प्रदेश के अलग-अलग मौसम के बीच का अंतर भी मिट रहा है। पहली बार जारी की गई स्टेट ऑफ एनवायरमेंट रिपोर्ट बता रही है कि प्रदेश में मौसम का बदलाव अब असर दिखा रहा है। पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के साथ मिलकर राज्य पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक 1990 के बाद से ही प्रदेश में तापमान बढ़ना शुरू हो गया था और यह लगातार जारी है।
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पिछले सौ साल में 0.46 डिग्री तापमान बढ़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक पहाड़ी जिलों का औसत वार्षिक तापमान 0.58 से लेकर 0.41 डिग्री सेंटीग्रेट तक बढ़ा है। इसके उलट हरिद्वार में यह वृद्धि 0.34 दर्ज की गई है। प्रदेश के लिए चिंता की बात यह भी है कि बारिश अब कम हो रही है। पिछले सालों में प्रदेश में बारिश 13.5 सेमी कम हो गई है।
यह पाया गया है कि प्रदेश के पर्वतीय जिलों में बारिश लगातार कम होती जा रही है। इतना ही नहीं प्रदेश में मौसमों के बीच का अंतर भी मिट रहा है। बरसात के मौसम में बारिश कम हो रही है और सर्दियों में अब ठंड कम होती जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक इस बदलाव का असर आने वाले समय में और तेजी से उभर कर सामने आ सकता है।
बर्फ और ग्लेशियर
रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और इस वजह से ग्लेशियर झीलों का निर्माण भी हो रहा है। इसका असर नदियों पर भी पड़ रहा है। कोसी जलसंग्रहण क्षेत्र में ही कोसी की सहायक नदियों की लंबाई करीब 225 किलोमीटर थी, जो अब घटकर 41 किलोमीटर ही रह गई है।
वनाग्नि जैव विविधता को पहुंचा रही नुकसान
रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि जैव विविधता के लिहाज से प्रदेश बहुत भाग्यशाली है, लेकिन जंगल की आग इस जैव विविधता को खासा नुकसान पहुंचा रही हैै। यह भी पाया गया है कि अधिकतर आग मानव जनित हैं और चीड़ के जंगल इसके प्रति अधिक संवेदनशील हैं।
बड़े बांधों पर सवाल
पंचेश्वर बांध के कारण ही 193 किस्म के पेड़ और औषधीय पौधें, 43 प्रकार के स्तनपायी, करीब 70 तरह की चिड़ियां, 47 तरह की तितलियां और 30 तरह की मछलियां प्रभावित होंगी। इसी तरह से टिहरी बांध का भी असर पड़ा है।
कचरे के ढेर मेें तब्दील होते शहर
रिपोर्ट में तेज शहरीकरण और कचरे का व्यापक प्रबंध न होने पर भी चिंता जताई गई है। यह पाया गया है कि कुल उत्पन्न होने वाले कचरे में से करीब 40 प्रतिशत कचरा उठ ही नहीं पाता और शहरों में ही डंप होकर रह जाता है। कुल 17 प्रतिशत कचरा ही है, जिसको रिसाइकिल किया जा सकता है।
सभी विभागों को भेजी जाएगी यह रिपोर्ट
यह रिपोर्ट ही इसलिए तैयार की गई है कि प्रदेश की पर्यावरण की चुनौतियों को समझा जा सके और समाधान खोजा जा सके। पहली बार यह रिपोर्ट जारी की जा रही है। रिपोर्ट में मौसम में बदलाव, शहरीकरण, जैव विविधता, आपदा आदि पर फोकस किया गया है। बोर्ड इस रिपोर्ट को प्रदेश के विभिन्न विभागों को भेजेगा, जिससे विभाग पर्यावरण के आधार पर परियोजनाएं तैयार कर सकें।
- एसपी सुबुद्धि, सदस्य सचिव, पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड