कई सौ साल का इतिहास समेटे है विष्णु प्रिया पेड़, चीन की तोपों के गोले भी छू नहीं पाए थे इसे
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प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक और अपने में कई सौ साल का इतिहास समेटे कई पेड़ भी हैं। वन विभाग अगर चैंपियन ट्री की देखभाल करता है तो प्रदेेश के कई अलग-अलग हिस्सों में ऐसे पेड़ भी हैं जिनसे धार्मिक मान्यताएं जुड़ीं हैं और लोग इनकी पूजा करते हैं। जोशीमठ में कल्पवृक्ष नाम का बेहद पुराना पेड़ है।
मान्यता है कि इसी वृक्ष के नीचे बैठकर आदिगुरू शंकराचार्य ने तपस्या की थी। माना जाता है कि यह पेड़ करीब 1200 साल पुराना है। इसी तरह चीन सीमा से लगी नीति घाटी में मलारी गांव में विष्णु प्रिया वृक्ष है। गांव के सिंचित धान वाले क्षेत्र (सेरा) में स्थित इस पेड़ की पूजा होती है। हर बारह साल में यहां यज्ञ होता है। माना जाता है कि भारत-चीन युद्ध के दौरान चीनी सेना की ओर से दागे गए गोले इस पेड़ को छू नहीं पाए, जबकि आसपास के पेड़ों को नुकसान पहुंचा।
तीर्थ पुरोहित महापंचायत के प्रवक्ता डा. बृजेश सती के मुताबिक इस पेड़ के फल को घिसा जाए तो इससे चंदन जैसी खुशबू आती है। मलारी जोशीमठ मार्ग पर ही स्थित बड़ागांव में देवदार का एक पेड़ है जिसकी लंबे समय से पूजा होती आ रही है। जिस दिन बदरीनाथ धाम के कपाट खुलते हैं, उसी दिन इस पेड़ की भी पूजा होती है। हर बार नई फसल का एक अंश इस पेड़ को अर्पित किया जाता है।
वन विभाग का चैंपियन ट्री
वन विभाग को कुछ समय पहले ही कुमाऊं में नंधौर में जौलासाल के जंगल में साल का एक पेड़ मिला था। यह पेड़ करीब 200 साल पुराना बताया जा रहा है। मुख्य वन संरक्षक पराग मधुकर धकाते के मुताबिक इस पेड़ के तने की मोटाई करीब 54 फीट है। यह मोटाई इतनी है कि करीब एक दर्जन आदमी घेरा बनाकर इस पेड़ को घेर पाते हैं। वन विभाग इस पेड़ को चैंपियन पेड़ कहता है।
कई पेड़ों को देवस्वरूप मानकर होती है पूजा
प्रदेश में पूरे-पूरे जंगल देवी देवताओं को समर्पित करने के कई उदाहरण मौजूद हैं। इसी तरह कई पेड़ भी हैं जिन्हें जीवंत देवताओं की श्रेणी में माना जाता है। लोग इनकी पूजा करते हैं और इष्ट-अनिष्ट का अनुमान भी इनसे लगाते हैं। देवदार, पीपल, बड़, बेलपत्र आदि को देव स्वरूप में पूजा जाता है। इसी तरह से थुनेर, भोजपत्र आदि का भी धार्मिक महत्व है। ब्रह्मकमल को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। बुरांश फूल को यमुनोत्री क्षेत्र में फूल त्योहार के दिन भगवान सोमेश्वर को अर्पित किया जाता है। इनसे अलग हटकर प्रदेश में ऐसे पेड़ भी हैं जिनकी भगवान स्वरूप में पूजा लंबे समय से हो रही है। ये पेड़ हमारी सांस्कृति और अध्यात्मिक धरोहर भी हैं।
-बृजेश सती, तीर्थ पुरोहित
प्रदेश में 45 प्रतिशत हैं सेक्रेड ग्रोव
देव वनों पर विस्तृत अध्ययन कर रहे पिथौरागढ़ के चंदर सिंह नेगी के मुताबिक प्रदेश में पवित्र क्षेत्रों का करीब 44 प्रतिशत पवित्र पेड़ों के समूह (सेक्रेड ग्रोव) का है। 45 प्रतिशत पवित्र जंगल हैं। पांच प्रतिशत बुग्याल और छह प्रतिशत जल क्षेत्र हैं। इन सबसे धार्मिक विश्वास, मान्यताएं, टोटके, टैबू आदि जुड़े हुए हैं।