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उत्तराखंड में वोटरों की दुविधा, भाजपा-कांग्रेस की सुविधा
राकेश खंडूड़ी / अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 19 Jan 2017 12:37 PM IST
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- फोटो : file photo
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क्षेत्रीय राजनीति के पैरोकार वोटरों की दुविधा में क्षेत्रीय और निर्दल प्रत्याशियों के खाते में जाकर बिखर जाने वाले 23 फीसदी वोटों का अगर ध्रुवीकरण हो जाए तो उत्तराखंड की राजनीति में बदलाव आ जाए।
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फिलहाल ऐसे वोटरों की दुविधा, भाजपा-कांग्रेस के लिए सुविधा बनी हुई है। क्षेत्रीय सरोकार की राजनीति के पैरोकार कहते हैं कि इसी करिश्मे की आस में तीन विधानसभा चुनाव गुजर गए और चौथे की तैयारी जारी है। अब चुनावी मौसम में एक बार फिर तीसरे विकल्प की संभावनाएं टटोली जा रही हैं। गठबंधन बनाए जा रहे हैं, मगर इतिहास गवाह है कि चुनाव से ऐन पहले होने वाले इन गठबंधनों पर वोटर यकीन नहीं करते।
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उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय जनमानस का मिजाज सत्तारोधी माना जाता है। उसके इसी मिजाज का नतीजा है कि अब तक हुए तीन विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस बहुमत का जादुई आंकड़ा बहुत मुश्किल से हासिल कर पाए । 2002 के चुनाव में कांग्रेस बहुमत का सिर्फ आंकड़ा ही छू पाई थी। 2007 और 2012 में कांग्रेस और भाजपा को गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी। यानी राज्य में एक बड़ा वोट बैंक ऐसा है जो भाजपा और कांग्रेस दोनों को पसंद नहीं करता है। लिहाजा नापसंदगी का यही वोट बैंक निर्दलीय प्रत्याशी, क्षेत्रीय और अन्य राजनीतिक दलों के खाते में चला जाता है।
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वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के वोट प्रतिशत के आंकड़े इस तथ्य की गवाही पेश करते हैं। इस चुनाव में निर्दलियों को 12.34 फीसदी वोट मिले। चुनाव में उतरे दो दर्जन क्षेत्रीय व अन्य दलों खाते में 8.55 फीसदी वोट दर्ज हुए। ऐसा नहीं कि इस बड़े वोट बैंक को साधने की कोशिशें नहीं हुईं। राज्य आंदोलन की सूत्रधार उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) को तो तीसरे विकल्प के तौर पर ही देखा गया। मगर इसके नेताओं पर सियासी महत्वाकांक्षा इस कदर हावी रही कि भाजपा-कांग्रेस से लड़ने के बजाय वे पूरे पांच साल आपस में ही लड़ते-भिड़ते रहे। कहीं न कहीं तीसरे विकल्प की ओर आस लगाए बैठी जनता नाउम्मीद हुई और विश्वसनीय विकल्प के अभाव में बंट गई।
2012 चुनाव : आंकड़ों में वोटों का गणित
- वर्ष 2012 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों ने 12.34 फीसदी वोट हासिल किए
- चुनाव में आपसी झगड़े में उक्रांद का वोट बैंक 5.49 फीसदी से घटकर 1.93 फीसदी रह गया
- भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर अन्य राष्ट्रीय दलों को 8.55 फीसदी वोट मिले
- करीब 23 फीसदी वोट भाजपा-कांग्रेस को नहीं मिले और बिखर गए