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स्मृति शेष : गूंजती रहेगी सुंदरलाल बहुगुणा की सादगी, विश्वास और अकूत प्रेम की यह आवाज
Sat, 22 May 2021 02:42 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Sat, 22 May 2021 02:42 PM IST
सार
पर्यावरण से प्रेम को सुंदरलाल बहुगुणा ने पर्यावरण का ककहरा किसी विश्वविद्यालय में नहीं बल्कि जीवन की किताब से कठोर तप के बाद हासिल किया।
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सुंदरलाल बहुगुणा
- फोटो : https://www.facebook.com/profile.php?id=100008309481569
विस्तार
पर्यावरण के प्रति हमेशा संवेदनशील रहे सुंदरलाल बहुगुणा अपनी जीवटता और लगातार कोशिश के बलबूते पर्यावरण संरक्षण के संदेश को वैश्विक मंच पर पहुंचाने में सफल रहे।
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पर्यावरण से प्रेम को सुंदरलाल बहुगुणा ने पर्यावरण का ककहरा किसी विश्वविद्यालय में नहीं बल्कि जीवन की किताब से कठोर तप के बाद हासिल किया। टिहरी बांध के विरोध में उनके कई-कई दिन के सत्याग्रह को लोग आज भी याद करते हैं। टिहरी में भागीरथी के तट पर शोर करते हुए बहती भागीरथी के किनारे धुनी रमाई तो लंबे समय तक वहां से हटे नहीं। टिहरी बांध प्रशासन और सरकारी अमला जब हर तरह के उपहार लिए करबद्ध सामने खड़ा तो पर्यावरण का यह मनीषी डिगा नहीं। टिहरी बांध के पर्यावरण प्रभाव के अध्ययन की बात सरकार से मनवा कर ही दम लिया।
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1970 के बाद का दशक पर्यावरण के मामले में कई तरह के बदलाव लेकर आया। अधिकतर वन कानून इसी दौर की देन भी हैं। टिहरी में भागीरथी के किनारे से जगी पर्यावरण की अलख इतनी मजबूत थी कि तत्कालीन केंद्र सरकार को पेड़ों के कटान पर रोक का आदेश जारी करना पड़ा। गहरी पारस्थतिकीय समझ, पर्यावरण और मानव जीवन के बीच रिश्ते की गहरी समझ ही थी कि टिहरी से उठी आवाज वैश्विक हो गई।
उत्तराखंड के पर्यावरण का मुद्दा सिर्फ उत्तराखंड तक ही सीमित नहीं रह गया। सुंदरलाल बहुगुणा की हिमालयी राज्यों की पदयात्रा ने उसे व्यापक फलक दे दिया। पांच हजार किलोमीटर की यह पदयात्रा जनचेतना के हिसाब से बेहद कारगर साबित हुई। विनोबा भावे के आह्वान और महात्मा गांधी के जीवन की प्रेरणा का परिणाम निकला कि बहुगुणा पेड़ों को दिल दे बैठे। उसके बाद शुरू हुई मुहिम ने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर योजनाकारों को सोचने के लिए विवश किया।
साक्षातकार, सेमिनार आदि के जरिये यह मुहिम देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने का सबब बनी। चिपको एक पहचाना हुआ नाम बना और लोग सुंदरलाल बहुगुणा के साथ ही गौरा देवी सहित अन्य नामों को भी कहने-सुनने लगे। कोविड काल में इस मनीषी का प्रकृति प्रेम फिर एक बार और प्रासंगिक हुआ। प्रकृति में मिट्टी, हवा, पानी ने नया संदर्भ ग्रहण किया। प्रकृति के इस ब्रांड एंबेसडर के विचारों ने नया अर्थ ग्रहण किया है।
अब प्रकृति का प्रेम एक एलीट बहस नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। ऑक्सीजन का मोल अब सरकार की समझ भी आ रहा है। मिट्टी से जुड़ाव को नए सिरे से महसूस किया जा रहा है। ऋषिकेश में गंगा किनारे से बीच-बीच में आवाज सुनाई देती रही। यही वह जगह है जहां इस प्रकृति के पुजारी ने अंतिम सांस ली। सादगी, विश्वास और अकूत प्रेम की इस आवाज में दम है और अब वह गूंजती ही रहेगी।
शिवानंद आश्रम में कई बार आए थे बहुगुणा
ऋषिकेश के शिवानंद आश्रम पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा कई बार आए थे। जब भी वह ऋषिकेश में पर्यावरण संबंधी गोष्ठियों में भाग लेने के लिए आते थे तो शिवानंद आश्रम जरूर जाते थे। पूर्व शिक्षक नेता बंशीधर पोखरियाल बताते हैं कि पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा 80 और 90 के दशक में ऋषिकेश आते थे, यहां पर वह शिवानंद आश्रम के तत्कालीन परमाध्यक्ष चिदानंदजी महाराज के दर्शन करने आते थे।
बंशीधर पोखरियाल ने बताया कि वह कई बार श्रीभरत मंदिर इंटर कॉलेज और राजकीय महाविद्यालय ऋषिकेश में भी पर्यावरण गोष्ठियों में शामिल होने के लिए आए थे। वह पर्वतीय क्षेत्रों में बनने वाले बड़े बांधों के विरोधी थे। गोष्ठी के दौरान वह चीड़ के पेड़ों के बजाय बांज के पेड़ लगाने के लिए कहते थे।
पर्वतीय क्षेत्रों में कई जिलों में उन्होंने ग्रामीणों की मदद से जंगल के काफी बड़े क्षेत्र में बांज का प्लांटेशन करवाया था। आज उन क्षेत्रों में जलस्रोत अच्छे हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता रमाबल्लभ भट्ट ने बताया कि सुंदरलाल बहुगुणा 90 के दशक के शुरूतक ऋषिकेश आते थे। वह मुनिकीरेती क्षेत्र में ही ज्यादा आते थे।