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यादें: ...जब सुंदरलाल बहुगुणा ने पद्मश्री लेने से कर दिया था इनकार, समर्थन जुटाने का जादू था हासिल

Fri, 21 May 2021 11:24 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 21 May 2021 11:24 PM IST
सार

उत्तराखंड में पर्यावरण बचाने के आंदोलनों का जब भी जिक्र होगा तो पर्यावरण के गांधी सुंदरलाल बहुगुणा का नाम सबसे ऊपर आएगा।

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Uttarakhand Sunderlal Bahuguna death News: Sunderlal Bahuguna Denied for receive Padama shri award
सुंदरलाल बहुगुणा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

सुंदरलाल बहुगुणा ने पर्यावरण बचाने के लिए गांव-गांव तक जो अलख जगाई, वह सदियों तक याद की जाती रहेगी। पर्यावरण संरक्षण की इसी हनक में उन्होंने पद्मश्री पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था। हालांकि, पर्यावरण की रक्षा के लिए बहुगुणा ने अपनी मुहिम जरा भी धीमी नहीं पड़ने दी। पूर्ण लक्ष्य हासिल करने के लिए वह अपने रास्ते चलते रहे। 

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लोगों के समर्थन का दायरा बढ़ाने और पर्यावरण के प्रति जागरुकता लाने के लिए उन्होंने 1980 के दशक की शुरुआत में हिमालय के इलाकों में 5,000 किलोमीटर लंबा मार्च शुरू किया। वह गांव-गांव गए और लोगों का समर्थन जुटाना शुरू किया।
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वह पर्यावरण के प्रति लोगों को तो जगा ही रहे थे साथ ही समाज के कमजोरों और महिला सशक्तिकरण के लिए भी काम कर रहे थे। उनका पूरा आंदोलन महात्मा गांधी के विचारों सत्याग्रह और अहिंसा पर आधारित था।

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इसको लेकर वो इंदिरा गांधी से भी मिले और आखिरकार उनकी अपील की सरकार ने सुध ली और हरे पेड़ों की कटाई पर 15 साल के लिए रोक लगा दी गई। इस दौरान 1981 में उन्हें केंद्र सरकार की ओर से पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा भी हुई, लेकिन उन्होंने इसे लेने से इनकार कर दिया। अलबत्ता, 1987 में चिपको आंदोलन को पर्यावरण संरक्षण और भारत के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के हित में आवाज उठाने के लिए ‘राइट लाइवलिहुड अवार्ड’ जरूर मिला।

गांधी जी के विचारों से प्रेरित थे बहुगु़णा

वैसे पद्मविभूषण सुंदरलाल बहुगुणा को लोग सीधे चिपको आंदोलन और टिहरी आंदोलन से ही जोड़ते हैं। लेकिन, कम ही लोग जानते हैं कि उनका सामाजिक सरोकार से वास्ता तभी शुरू हो गया था, जब वह महज 13 साल के थे। वह गांधी जी के विचारों से प्रेरित थे और स्वतंत्रता संग्राम में उनके आंदोलनों से काफी प्रभावित थे।

वह पढ़ाई के लिए लाहौर गए थे तो वहां भी बहुत ही कम उम्र में समानता के अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी। उन्होंने टिहरी के आसपास शराब के खिलाफ भी आंदोलन चलाया था, लेकिन बाद में वन और पर्यावरण की रक्षा के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो गए थे।

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