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Uttarakhand: राज्य आंदोलनकारियों का मामला...लंबे इंतजार के बाद भी पूरी नहीं हुई नौकरी में आरक्षण की मुराद

Thu, 27 Jun 2024 08:02 AM IST
रेनू सकलानी बिशन सिंह बोरा, अमर उजाला ब्यूरो , देहरादून
बिशन सिंह बोरा, अमर उजाला ब्यूरो , देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Thu, 27 Jun 2024 08:02 AM IST
सार

राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों की लंबे इंतजार के बाद भी नौकरी में आरक्षण की मुराद पूरी नहीं हो पाई है। एनडी तिवारी सरकार ने वर्ष 2004 में राज्य आंदोलनकारियों को नौकरी में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का शासनादेश जारी किया था।

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Uttarakhand State agitators wish 10 percent horizontal reservation in government jobs was not fulfilled
मुख्यमंत्री धामी - फोटो : सोशल मीडिया हैंडल

विस्तार

धामी सरकार राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरी में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का लाभ देना चाहती है। इसके लिए इसी साल फरवरी में सरकार ने प्रवर समिति की सिफारिशों को मानते हुए विधेयक कुछ संशोधनों के साथ राजभवन भेजा, जो एक बार फिर लटक गया है।

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पिछले चार माह से राजभवन विधेयक पर निर्णय नहीं ले पाया, जिससे राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों की लंबे इंतजार के बाद भी नौकरी में आरक्षण की मुराद पूरी नहीं हो पाई है। हालांकि, राजभवन से इसमें देरी की एक वजह लोकसभा चुनाव और राज्यपाल के नैनीताल में होने बताया गया है। विस से इस साल फरवरी में यूसीसी विधेयक पास करने के साथ चिह्नित राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों को राजकीय सेवा में आरक्षण विधेयक 2023 संशोधन के साथ पारित किया गया था।

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एनडी तिवारी सरकार ने किया था शासनादेश जारी
यूसीसी को राजभवन से मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन राज्य आंदोलनकारियों को नौकरी में आरक्षण का विधेयक राजभवन में लंबित है। इस विधेयक को इससे पहले आठ सितंबर 2023 को सदन में पेश किया गया था, लेकिन कुछ सदस्यों ने विधेयक के प्रावधानों में संशोधन के लिए इसे प्रवर समिति को भेजने की मांग की थी। राज्य आंदोलनकारियों के मुताबिक, एनडी तिवारी सरकार ने वर्ष 2004 में राज्य आंदोलनकारियों को नौकरी में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का शासनादेश जारी किया था।

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तब दो शासनादेश हुए थे। पहला समूह ग और घ के लिए जिसमें बिना परीक्षा के सीधे नियुक्ति थी। इसके लिए शर्त थी कम से कम सात दिन जेल में रहे हों या घायल हुए हों। दूसरा सात दिन से कम की जेल या घायल इनके लिए राज्याधीन सेवाओं में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। इस शासनादेश के बाद करीब 1,700 कर्मचारी, आंदोलनकारी कोटे से नौकरी में लगे हैं। वर्ष 2018 में हाईकोर्ट ने इस शासनादेश को रद्द कर दिया था।

वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान के मुताबिक, तत्कालीन त्रिवेंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर आदेश को रद्द कर दिया था, जबकि होना यह चाहिए था कि सरकार को कोर्ट के आदेश को रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए था या फिर विस में विधेयक लाना चाहिए था। हालांकि, हरीश रावत सरकार का विधेयक वर्ष 2016 से राजभवन में लंबित था।

विधेयक में ये की गई है व्यवस्था

राज्य आंदोलनकारियों के सभी पात्र आश्रितों को आरक्षण का लाभ मिलेगा।

2004 से क्षैतिज आरक्षण के माध्यम से सरकारी सेवा में शामिल हो चुके आंदोलनकारियों की सेवाओं को वैधता प्रदान करेगा।

चिह्नित आंदोलनकारियों की पत्नी या पति, पुत्र एवं पुत्री के साथ ही विवाहिता, विधवा, पति द्वारा परित्यक्त, तलाकशुदा पुत्री को इसमें शामिल किया गया है।

विधेयक को मंजूरी मिली तो 13,000 को मिलेगा लाभ

राज्य में चिह्नितराज्य आंदोलनकारियों की संख्या करीब 13000 है। विधेयक को राजभवन से मंजूरी मिलती तो आरक्षण का लाभ इन हजारों राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों को मिलता।

कब क्या हुआ

2004 में एनडी तिवारी सरकार में राज्य आंदोलनकारियों को नौकरी में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का शासनादेश हुआ।

इस शासनादेश के आधार पर करीब 1,700 आंदोलनकारी सरकारी नौकरी में लगे।

वर्ष 2016 में हरीश रावत सरकार में आरक्षण को कानूनी रूप देने के लिए मंत्रिमंडल ने विधेयक पास कर राजभवन भेजा।

लगभग छह साल से भी अधिक समय तक विधेयक राजभवन में लंबित रहा।

वर्ष 2021 में सीएम धामी ने अपने पहले कार्यकाल में कैबिनेट से प्रस्ताव पास कर राजभवन को आरक्षण के मसले से अवगत कराया।

वर्ष 2023 में राजभवन से विधेयक कुछ आपत्ति के साथ वापस भेजा गया।

इस साल धामी सरकार ने विधेयक को कुछ संशोधनों के साथ फिर से राजभवन भेजा।

राज्यपाल इन दिनों नैनीताल में हैं, जबकि इससे पहले राज्य में चुनाव थे। आरक्षण के मसले को पूर्व में हाईकोर्ट से रद्द किया जा चुका है। इसमें यह देखना होगा इसे फिर से उसी आधार पर तो नहीं भेजा गया है या इसमें कोई बदलाव किया गया है। -रविनाथ रामन, सचिव राज्यपाल

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राज्य आंदोलनकारियों को क्षैतिज आरक्षण विधेयक के मसले पर राज्यपाल के सचिव से बात की जाएगी। राज्य में अब तक चुनाव आचार संहिता लगी हुई थी जो अब खत्म हो चुकी है। अब राजभवन से इस मसले पर वार्ता की जाएगी। - दिलीप जावलकर, सचिव, गृह

विस से पारित विधेयक को राजभवन में इतने अधिक समय तक रोके रखना असांवधानिक और अनैतिक है। राजभवन या इसे अनुमोदित करे या लौटा दे। पिछले 13 साल से आंदोलनकारियों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। इस बीच एक लाख सरकारी नौकरियों निकल चुकी हैं। -रविंद्र जुगरान, वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी

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