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कहानी लोकसभा चुनाव की: उत्तराखंड में जब जनता अपने पर आई...तो दिग्गजों ने भी अपनी सीट गंवाई

Sun, 31 Mar 2024 07:01 PM IST
अलका त्यागी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 31 Mar 2024 07:01 PM IST
सार

अस्तित्व में आने से पहले और उसके बाद उत्तराखंड 17 चुनावों का साक्षी रहा है। 1951 से 2019 तक हुए इन चुनावों में कांग्रेस, भाजपा, बसपा समेत तकरीबन सभी राष्ट्रीय दलों ने अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे।

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Uttarakhand Lok Sabha elections Flashback Story When public came to power in many leaders lost their seat
कहानी लोकसभा चुनाव की - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की जनता जब अपने पर आई तो उसने फिर प्रत्याशी का कद या पद नहीं देखा, जिसे पसंद किया उसे जिताया और जो नापसंद था उसे हरा दिया। एक जमाने में भाजपा की राजनीति के तीसरे बड़े ध्रुव डॉ.मुरली मनोहर जोशी रहे हों या खांटी राजनीतिज्ञ नारायण दत्त तिवारी या फिर दिग्गज हरीश रावत, लोकसभा चुनाव में इन सभी दिग्गजों ने करारी शिकस्त का सामना किया। उनकी पराजय आज भी सियासी हलकों में राजनीतिज्ञों के लिए एक सबक के तौर पर देखी जाती है।

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अस्तित्व में आने से पहले और उसके बाद उत्तराखंड 17 चुनावों का साक्षी रहा है। 1951 से 2019 तक हुए इन चुनावों में कांग्रेस, भाजपा, बसपा समेत तकरीबन सभी राष्ट्रीय दलों ने अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे। इन चुनावों में 600 से ज्यादा नेताओं की जमानत जब्त हुई। इनमें वे नाम भी शामिल हैं, जिन्हें राजनीति का धुरंधर माना जाता था। 1984 के लोकसभा चुनाव में अल्मोड़ा सीट पर उस दौर के नौजवान नेता हरीश रावत को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया। हरीश ने खांटी राजनीतिज्ञ डॉ.मुरली मनोहर जोशी को न सिर्फ हराया, बल्कि उनकी जमानत तक जब्त करा दी। जोशी को महज 14.79 फीसदी वोट पर संतोष करना पड़ा। इसी सीट पर 1989 के चुनाव में भगत सिंह कोश्यारी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। वह तीसरे स्थान पर रहे। यही वह चुनाव था, जिसमें निर्दलीय चुनाव लड़े काशी सिंह ऐरी ने 39 फीसदी से अधिक वोट लेकर अपने विरोधियों को हैरान कर दिया था।
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टिहरी लोस सीट पर आठ बार के सांसद रहे महाराजा मानवेंद्र शाह को भी पराजय का सामना करना पड़ा था। उन्हें 1971 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार से मात मिली। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी परिपूर्णानंद पैन्यूली ने पराजित कर दिया। दिग्गज राजनेता एनडी तिवारी की चुनावी हार का भी अपना इतिहास है। राम लहर के रथ पर सवार भाजपा ने 1991 के लोस चुनाव में बलराज पासी को कांग्रेस के एनडी तिवारी के खिलाफ मैदान में उतारा। पासी ने एनडी तिवारी को पराजित कर दिया। एनडी की यह पराजय कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा झटका थी। इस सीट से एनडी तिवारी चुनाव जीतते आ रहे थे। कद्दावर मुरली मनोहर जोशी को हराने वाले हरीश रावत भी चुनावी पराजयों से महफूज नहीं रहे। अल्मोड़ा सीट पर ही उन्हें भाजपा के बची सिंह रावत के हाथों लगातार तीन हार का सामना करना पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में हरीश रावत नैनीताल-ऊधम सिंह नगर सीट पर भी चुनाव हार गए।

दिग्गजों की चुनावी पराजयों का इतिहास यहीं नहीं थमा है। हरिद्वार लोस सीट पर 1989 और 1991 में मायावती बसपा के टिकट पर दो बार चुनाव हार गईं। बसपा सुप्रीमो की 1991 के चुनाव में तो जमानत तक जब्त हो गई थी। उन्हें महज चार फीसदी वोट ही नसीब हुए। 1989 के चुनाव में जरूर उन्हें 22.63 फीसदी वोट मिले थे। गढ़वाल लोस सीट चार बार सांसद रहे मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी को भी 1996 और 2009 के लोस चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। गढ़वाल सीट पर 1989 में सतपाल महाराज भी जनता दल के चंद्रमोहन सिंह नेगी से चुनाव हारे थे।

ये दिग्गज भी हारे चुनाव
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रणेता इंद्रमणि बडोनी भी टिहरी लोस सीट से चुनाव हारे। 1989 में उन्हें कांग्रेस के ब्रह्म दत्त ने हराया। बडोनी निर्दलीय चुनाव लड़े थे और उन्हें 35.08 प्रतिशत वोट मिले थे। जबकि ब्रह्म दत्त को 38.04 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। 1999 के लोस चुनाव में कांग्रेस ने विजय बहुगुणा को उतारा था। बहुगुणा भाजपा के मानवेंद्र शाह से चुनाव हार गए थे। इसी चुनाव में मुन्ना सिंह चौहान समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन वह जमानत भी नहीं बचा सके। 1998 के चुनाव में टिहरी सीट पर मुन्ना सिंह चौहान और नव प्रभात की जमानत जब्त हो गई थी। मुन्ना सपा और नव प्रभात बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इसी चुनाव में कांग्रेस ने हीरा सिंह बिष्ट को उम्मीदवार बनाया था और उन्हें भी भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा था।

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