उत्तराखंड लोकसभा चुनाव 2024: हरिद्वार लोकसभा में लहरों से बदले जनप्रतिनिधि...तटों से तटस्थ रहे तमाम मुद्दे
Uttarakhand Lok Sabha Elections 2024: सरकार अभी ड्रेनेज सिस्टम और कूड़ा प्रबंधन जैसे मोर्चों पर खुद को अव्वल साबित नहीं कर पाई है। स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर बिजली, पानी और विकास के कई आयामों पर काम करना बाकी है।
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राज्य गठन के बाद से सरकारें बदलीं और सांसद भी बदले, लेकिन कई मोर्चों पर हालात में अभी तक बदलाव नहीं हुआ है। जब लोकसभा चुनाव आते हैं तो फिर से चुनाव में वहीं मुद्दे और दावे उभरकर आते हैं। स्थिति यह है कि पिछले दस सालों में सड़कों और पुलों के जाल बिछे पर जाम की समस्या बरकरार है।
सरकार अभी ड्रेनेज सिस्टम और कूड़ा प्रबंधन जैसे मोर्चों पर खुद को अव्वल साबित नहीं कर पाई है। स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर बिजली, पानी और विकास के कई आयामों पर काम करना बाकी है। सत्ता दल कराए गए कामों की दुहाई देगा तो विपक्ष जनता की दुश्वारियों की। अब जनता के सामने मुश्किल यह है कि इस बार किसकी बात पर विश्वास करे। हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र में कुछ ऐसे ही मुद्दे हैं, जिन पर आने वाले समय चुनावी जंग देखने को मिलेगी।
हमेशा जीवित रहा है अवैध खनन का मुद्दा
सरकारें किसी भी पार्टी की रही हों, लेकिन अवैध खनन का मुद्दा हमेशा जीवित रहा। हरिद्वार जिला अवैध खनन को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहा। इस कारोबार को लेकर फायरिंग समेत आपसी संघर्ष की घटनाएं भी सामने आती रही। हरिद्वार में मातृ सदन के स्वामी शिवानंद बरसों से अवैध खनन के खिलाफ समय-समय पर अनशन करते रहे हैं। अनशन के चलते प्रो. जीडी अग्रवाल की मौत से यह मुद्दा और भी सुर्खियों में आ गया। अब चुनावी रण जम चुका है तो तो सत्ता और विरोधि पार्टियों के बीच फिर से आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू होगा।
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पांच साल से बकाया करोड़ों का गन्ना भुगतान बनेगा मुद्दा
किसान प्रधान हरिद्वार जिले में गन्ने का भुगतान हमेशा ज्वलंत मुद्दा रहा है। इसे लेकर साल भर किसान संगठन सड़कों पर उतरकर आंदोलन करते रहे हैं। हालांकि जब से शुगर मिलों ने डिस्टलरी स्थापित की है, तब से गन्ना भुगतान में सुधार हुआ है। इस बार उत्पादन घटने से मिलों को गन्ने के संकट का सामना करना पड़ रहा है। किसान गन्ना कोल्हुओं में न दें, इसके लिए मिलों ने बेहतर भुगतान किया है। लेकिन इकबालपुर शुगर मिल पर अभी पेराई सत्र 2018-19 का 104 करोड़ रुपये बकाया चल रहा है। विधानसभा में यह मुद्दा उठ चुका है।
बाहरी लोगों की आमद के हिसाब से विकास मॉडल की दरकार
धर्मनगरी हरिद्वार में स्थानीय आबादी से ज्यादा बाहर से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के हिसाब से विकास के मॉडल की दरकार है। हालांकि हरिद्वार शहर में विगत दस सालों में हाईवे और फ्लाईओवर का जाल बिछा है, लेकिन भारी संख्या में आने वाले वाहनों की पार्किंग और अन्य पर्यटक सुविधाओं को लेकर काम करना बाकी है। यात्रा सीजन में रूट डायवर्जन के बाद भी हरिद्वार शहर से बाहर निकलने में वाहनों को कई घंटे लग रहे हैं। नए रूट प्लान के साथ ही श्रद्धालुओं के ठहरने और पार्किंग को ध्यान में रखकर विकास का मॉडल तैयार करना होगा।
हर तरफ जाम निकाल रहा पसीना
हाईवे से लेकर शहर की आंतरिक सड़कों तक जाम के झाम की समस्या लगातर बनी है।
राज्य गठन के बाद से सभी सरकारों ने बेहतर यातायात प्रबंधन के वादे किए। इन पर काम भी हुआ लेकिन पूर्ण समाधान नहीं हुआ। हाईवे फोरलेन बनने के बाद भी स्थिति यह है कि रुड़की और हरिद्वार में आए दिन जाम मुसीबत बन रहा है। रुड़की शहर में दस साल पहले लगाई गई ट्रैफिक सिग्नल लाइटें अभी तक खराब पड़ी हैं। इसके अलावा जगह-जगह अतिक्रमण मुसीबत बना है। ई-रिक्शा के सुनियोजित संचालन और रेहड़ी ठेली वालों के व्यवस्थित वेंडिंग जोन अभी तक कागजों में ही चल रहे हैं।
लचर ड्रेनेज सिस्टम बना मुसीबत
इस बरसात में जिले में शहर और या गांव, सभी जगह बाढ़ जैसे हालात नजर आए। इसकी प्रमुख वजह ड्रेनेज सिस्टम की खामियां रही। हरिद्वार और रुड़की शहर में जलभराव ने भारी मुसीबत खड़ी की। रुड़की में लोगों ने पहली मंजिल तक पानी में डूबे मकानों की समस्या से निजात दिलाने के लिए हाईवे पर धरना तक दे दिया। पूर्व सीएम हरीश रावत समेत विभिन्न पार्टियों के दिग्गजों ने धरने को समर्थन दिया। करीब एक महीने की मशक्कत के बाद जिंदगी पटरी पर लौट सकी। इसी तरह लक्सर, भगवानपुर, बहादराबाद समेत तमाम कस्बों में जलभराव से जनजीवन अस्तव्यस्त रहा। हालांकि जलभराव दूर करने के लिए शासन की ओर से पुणे की एक कंपनी से हरिद्वार, भगवानपुर और रुड़की विस्तृत सर्वे कराया गया है। जिस पर आने वाले समय में काम शुरू होने की उम्मीद है।
अभी कई पुलों का इंतजार जारी
रुड़की में हाईवे पुल के जर्जर होने के बाद इसे आवाजाही के लिए बंद कर दिया गया है। स्कूल पहुंचने और हरिद्वार तक जाने के लिए बड़ वाहनों को हाईवे बाईपास तक करीब 12 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। शासन ने पुल निर्माण की स्वीकृति तो दे दी है लेकिन निर्माण शुरू नहीं हुआ है। उधर, रुड़की लक्सर मार्ग पर बहादरपुर रेलवे फाटक पर वाहनों का लंबा जाम लग रहा है। यहां रेलवे ओवरब्रिज की सख्त दरकार है। यह मार्ग कांवड़ सीजन, कुंभ और गंगा स्नान के समय वैकल्पिक मार्ग के रूप में इस्तेमाल होता है।
करोड़ों खर्च फिर भी कूड़ा प्रबंधन में पिछड़ा है क्षेत्र
स्वच्छता मिशन पर करोड़ों के खर्च के बाद भी हरिद्वार और रुड़की शहर के अलावा विभिन्न निकायों में कूड़ा प्रबंधन के ठोस इंतजाम नहीं हो सके। दोनों शहरों में प्लांट लगाने की शुरुआत हो चुकी है लेकिन बेहतर परिणाम नहीं मिले हैं। रुड़की में अभी भी कई सालों से बने कूड़े के पहाड़ का निस्तारण नहीं हो सका। यही नहीं घर-घर से गीला और सूखा कूड़ा एकत्र कर उसका निस्तारण करने की व्यवस्था भी बेहद लचर है। ऐसे में शहरों, कस्बों और गांवों को कूड़ा मुक्त बनाने के लिए धरातल पर काम किए जाने की जरूरत होगी।
बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना है चुनौती
हरिद्वार में नए मेडिकल कॉलेज के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है, लेकिन रुड़की और देहात क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद लचर हैं। सिविल अस्पताल से लेकर प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सकों और स्टॉफ का टोटा सबसे बड़ी समस्या है। इसके अलावा गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए भी लोगों को हायर सेंटर रेफर किया जा रहा है। रुड़की सिविल अस्पताल में क्रिटिकल केयर यूनिट तैयार करने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन यह कब धरातल पर उतरेगी... यह नहीं कहा जा सकता।