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उत्तराखंड: हाईकोर्ट ने क्वारंटीन सेंटरों की बदहाली और चारधाम को लेकर की सख्त टिप्पणी, कहा- खुद और जनता को धोखे में रख रही सरकार

Thu, 20 May 2021 10:33 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 20 May 2021 10:33 PM IST
सार

अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली, देहरादून निवासी सच्चिदानंद डबराल और अन्य ने हाईकोर्ट में क्वारंटीन सेंटरों व कोविड अस्पतालों की बदहाली, उत्तराखंड लौट रहे प्रवासियों की मदद एवं उनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने को लेकर हाईकोर्ट में अलग-अलग जनहित याचिकायें दायर की थीं।

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Uttarakhand High court Strict on Government for Quarantine center Bad Condition and Crowd in Char dham
नैनीताल हाईकोर्ट - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने क्वारंटीन सेंटरों की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान एक बार फिर प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लिया। अदालत ने कहा कि कोविड टेस्ट की लगातार घटती संख्या बताती है कि राज्य सरकार खुद को और लोगों को धोखे में रख रही है। सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे वीडियो से लग रहा है कि कपटोद्घाटन के दौरान चारधाम में पुजारियों की भीड़ थी और एसओपी का पालन नहीं हो रहा है।

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कोर्ट ने पर्यटन सचिव दिलीप जावलकर से कहा कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जिक्र है कि गद्दी पर बैठे-बैठे राजा को प्रजा का दुख पता नहीं चलता, इसके लिए मौके पर जाना पड़ता है। बृहस्पतिवार को मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये मामले की सुनवाई हुई। अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। 
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याचिकाकर्ता की ओर से उच्च न्यायालय को अवगत कराया गया कि राज्य सरकार ने चारधाम यात्रा के लिए एसओपी जारी की है वह सुप्रीम कोर्ट के 30 अप्रैल 2021 के आदेश का उल्लंघन है, जिसमें कहा गया था कि कोविड के दौरान किसी भी तरह की राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियां नहीं होंगी। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के लिए 551 ऑक्सीजन प्लांट लगाने की मंजूरी दी है। प्रधानमंत्री राहत कोष से यह कार्य होना है।
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इस संबंध में याचिकाकर्ता ने कोर्ट से आग्रह किया है कि उत्तराखंड में जितने ऑक्सीजन प्लांट लगने की मंजूरी मिली है, उसके लिए केंद्र को निर्देश दिए जाए। मुख्य सचिव ने कोर्ट को बताया गया कि उन्होंने केंद्र को इस संदर्भ में पत्र लिखा था, उसका 10 दिन बाद भी जवाब नहीं आया है। इस पर कोर्ट ने केंद्र से उत्तराखंड की मांग को गंभीरता से लेने अथवा अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की चेतावनी दी। पर्यटन सचिव दिलीप जावलकर से कोर्ट ने कहा कि वे स्वयं मौके पर जाकर एसओपी के पालन के हालात देखें।  

याचिकाकर्ता ने कहा कि सरकार ने अपने मेडिकल पोर्टल में ऋषिकेश के एसपीएस हॉस्पिटल में छह आईसीयू बेड होने की जानकारी दी है जबकि सीएमओ का कहना है कि वहां पर एक बेड भी आईसीयू का नहीं है। याचिकाकर्ता का कहना था कि हॉस्पिटलों में रेमडेसिविर इंजेक्शन की कमी का कारण खुद सरकार थी, क्योंकि सरकार ने इन इंजेक्शनों के लिए केंद्र के पास आवेदन भेजा ही नहीं था। पहले सरकार को 74 हजार इंजेक्शन की मंजूरी दी गई थी जिसे अब केंद्र ने बढ़ाकर 100024 कर दिया है। 

सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि अभी 310 मीट्रिक टन ऑक्सीजन उपलब्ध है। याचिकाकर्ता ने आग्रह किया कि जितने भी लोग बाहरी राज्यों से आ रहे हैं और 14 दिन क्वारंटीन हो रहे हैं, उनका खर्चा सरकार स्वयं वहन करे और नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत पिछले साल की तरह सरकार गरीब लोगों को निशुल्क अन्न मुहैया कराए। 

यह है मामला
बता दें कि पूर्व में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर माना था कि उत्तराखंड के सभी क्वारंटीन सेंटर बदहाल स्थिति में हैं और सरकार की ओर से वहां पर प्रवासियों के लिए उचित व्यवस्था नहीं की गई है। इसका संज्ञान लेकर कोर्ट ने अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग के लिए जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में जिलेवार निगरानी कमेटियां गठित करने के आदेश दिए थे और कमेटियों से सुझाव मांगे थे। 

बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने कोर्ट से पर्वतीय क्षेत्रों में छोटे कोविड अस्पतालों सहित अन्य त्वरित व्यवस्थाएं करने, मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए परिजनों से ऑडियो वीडियो कॉल व उनको नियमित स्वास्थ्य अपडेट बताने के केंद्र के दिशानिर्देशों के अनुपालन,  एमबीबीएस व नर्सिंग के छात्रों को कोविड ड्यूटी से पूर्व वैक्सीन लगवाने, पर्वतीय क्षेत्रों में समुचित वैक्सीन पहुंचवाने तथा राजस्थान की तर्ज पर घर-घर सर्वे करने सहित 15 बिंदु कोर्ट के सामने लिखित में रखे।

अदालत ने ये टिप्पणी भी की
- केंद्र सरकार मुख्य सचिव द्वारा भेजे गए मांग पत्रों की अनदेखी कर रही है उनका जवाब तक नहीं दिया जा रहा है, कोर्ट इसे गंभीरता से लेगी। (केंद्र सरकार के वकील से)
- केंद्र के निचले स्तर के अधिकारी ( निदेशक फार्मा वेद प्रकाश) के कोर्ट में उपस्थित होने और मंत्रालय के सक्षम अधिकारी के उपस्थित न होने पर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई और ऐसे अधिकारियों के खिलाफ वारंट जैसी सख्त कार्रवाई करने की चेतावनी दी।

ऑक्सीजन आवंटन में राज्य के साथ सौतेला व्यवहार, कार्रवाई को तैयार रहे केंद्र

कोरोना प्रबंधन संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उत्तराखंड राज्य के लिए किए जा रहे ऑक्सीजन आवंटन में गंभीर खामी पकड़ी और सरकार को इसे सुधारने के निर्देश दिए। कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि राज्य की विशेष और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद यहां के लिए ऑक्सीजन का कोटा 300 मीट्रिक टन क्यों नहीं किया जा रहा, जबकि तुलनात्मक रूप से विभिन्न राज्यों का कोटा इससे बहुत ज्यादा है।

कोर्ट ने कहा कि दुख की बात है कि पीएमओ में उच्च स्तर पर नियुक्त उत्तराखंड मूल के अधिकारी भी उत्तराखंड के प्रति संवेदनशील नहीं हैं और यहां के हिस्से के संसाधनों पर कुंडली मारे बैठे हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि उत्तराखंड के साथ इस महामारी में सौतेला व्यवहार किया जा रहा है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और हालात यही रहे तो केंद्र सरकार कोर्ट की कार्रवाई के लिए तैयार रहे।

राज्य के लिए ऑक्सीजन कोटे के आवंटन में बहुत ही विचित्र प्रणाली कोर्ट के सामने आई। यह बिल्कुल उल्टे बांस बरेली को कहावत को चरितार्थ करने जैसी ही थी। कोर्ट ने इस पर गंभीर आपति जताते हुए इसे सुधारने के निर्देश दिए। कोर्ट को बताया गया कि राज्य का कोटा 300 मीट्रिक टन है जबकि राज्य में 350 एमटी ऑक्सीजन उत्पादित होती है।

राज्य के उपयोग के लिए 183 एमटी कोटा निर्धारित है, लेकिन व्यवस्था यह है कि राज्य अपनी उत्पादित 350 एमटी में से 227 एमटी ऑक्सीजन केंद्रीय पूल में भेजता है और केवल 123 एमटी स्वयं प्रयुक्त करता है। जबकि 183 एमटी कोटे की शेष 60 एमटी ऑक्सीजन राज्य को जमशेदपुर और दुर्गापुर से उठानी होती है। कोर्ट ने इस पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि इससे जहां ऑक्सीजन भेजने और वापस मंगाने में भारी खर्च होता है वहीं समय और संसाधनों की भी बर्बादी होती है। कोर्ट ने इस व्यवस्था को सुधारने के निर्देश दिए।

याचिका में अमर उजाला की तमाम रिपोर्ट्स शामिल

उतराखंड हाईकोर्ट में कोरोना महामारी की व्यवस्थाओं से संबंधित याचिका में अमर उजाला की तमाम रिपोर्ट्स की विशेष भूमिका है। याचिकाकर्ता अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने याचिका के साथ इन रिपोर्ट्स की कटिंग शामिल करते हुए उनमें उठाए गए तथ्यों का हवाला दिया है।

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