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उत्तराखंड: हाईकोर्ट ने शिवालिक एलिफेंट रिजर्व को खत्म करने के शासनादेश पर लगाई रोक

Mon, 11 Jan 2021 10:22 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 11 Jan 2021 10:22 PM IST
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Uttarakhand High Court bans the mandate to abolish Shivalik Elephant Reserve
नैनीताल हाईकोर्ट - फोटो : फाइल फोटो

नैनीताल हाईकोर्ट ने शिवालिक एलिफेंट रिजर्व को खत्म करने के लिए जारी शासनादेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, जैव विविधता बोर्ड और स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

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सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने कहा कि सरकार ने यह नीतिगत फैसला लिया है, जबकि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि भारत सरकार की अनुमति के बिना यह निर्णय लिया गया है। मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान एवं न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 
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देहरादून की कार्यकर्ता रीनू पाल ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि 24 नवंबर 2020 को स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड की बैठक में देहरादून जौलीग्रांट एयरपोर्ट के विस्तार के लिए शिवालिक एलिफेंट रिजर्व को खत्म करने का निर्णय लिया गया था। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने एलिफेंट रिजर्व को खत्म करने के आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद सरकार ने आठ जनवरी को एलिफेंट रिजर्व को खत्म करने का शासनादेश जारी कर दिया।
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इसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने शिवालिक एलिफेंट रिजर्व को खत्म करने के शासनादेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार, राज्य सरकार, जैव विविधता बोर्ड, स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

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गंगा पर बनीं सिंचाई परियोजनाओं पर याची के प्रत्यावेदन को निस्तारित करने के निर्देश

नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड में गंगा पर स्थापित जल विद्युत एवं सिंचाई परियोजनाओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को जल शक्ति मंत्रालय को प्रत्यावेदन देने और जल शक्ति मंत्रालय को तीन माह के भीतर याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन को निस्तारित करने के निर्देश दिए हैं। 

मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान एवं न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। सामाजिक कार्यकर्ता भरत झुनझुनवाला ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि जल शक्ति मंत्रालय ने वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी की तमाम रिपोर्टों को दरकिनार करते हुए पर्यावरण प्रभाव की मात्रा को निर्धारित कर लिया है।

याचिका में कहा कि सिंचाई परियोजनाओं से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा निर्धारित करने में कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं लिया गया। इन परियोजनाओं से लगभग 50 फीसदी पानी छोड़ने की बात कही गई थी ताकि गंगा में मछलियां जीवित रह सकें और गंगा की सांस्कृतिक अस्मिता बनी रहे लेकिन जल शक्ति मंत्रालय ने केवल 20 से 30 प्रतिशत पानी छोड़ने की अधिसूचना जारी की।

इस मात्रा को निर्धारित करने में जल शक्ति मंत्रालय ने सेंट्रल वाटर कमीशन की एक रिपोर्ट को आधार बनाया था लेकिन सेंट्रल वाटर कमीशन की उस रिपोर्ट को तैयार करने वाले दो सदस्य एके गुसाईं और शरद जैन पहले ही 50 प्रतिशत पानी छोड़ने की बात कह चुके थे, इसलिए यह रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं कही जा सकती। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह जल शक्ति मंत्रालय को प्रत्यावेदन दे। वहीं कोर्ट ने जल शक्ति मंत्रालय को तीन माह के भीतर याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन को निस्तारित करने के निर्देश दिए हैं।

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