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Uttarakhand Election 2022 : चुनाव में बदजुबानी, दांवपेच और ध्रुवीकरण की कहानी, तीन तिगाड़े पर भाजपा और यूनिवर्सिटी के मुद्दे पर कांग्रेस असहज दिखी

Tue, 15 Feb 2022 12:57 PM IST
रेनू सकलानी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राकेश खंडूड़ी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राकेश खंडूड़ी Published by: रेनू सकलानी Updated Tue, 15 Feb 2022 12:57 PM IST
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सार
चुनाव से ऐन पहले धर्मनगरी हरिद्वार से धर्म संसद के विवादों का जिन्न बोतल से बाहर निकला।  जैसे-जैसे चुनाव निर्णायक दौर में पहुंचा भाजपा ने तुष्टिकरण के मुद्दे पर कांग्रेस को असहज करने की कोशिश की।
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Uttarakhand Election 2022 : The story of rhetoric, bets and polarization in elections
neta ji - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा के लिए हुआ चुनावी संग्राम पिछले चार चुनावों से कई मायनों में जुदा रहा। चुनाव में आए नेताओं ने खूब बदजुबानी की तो एक-दूसरे को प्रचार युद्ध में पछाड़ने के लिए ध्रुवीकरण के तीर छोड़े। चुनाव से ऐन पहले धर्मनगरी हरिद्वार से धर्म संसद के विवादों का जिन्न बोतल से बाहर निकला।


जैसे-जैसे चुनाव निर्णायक दौर में पहुंचा भाजपा ने तुष्टिकरण के मुद्दे पर कांग्रेस को असहज करने की कोशिश की। कांग्रेस ने तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने को लेकर बनाए गए तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा मुद्दे से भाजपा को घेरने का प्रयास किया। कांग्रेस रणनीतिक तरीके से धार्मिक ध्रुवीकरण के मुद्दे से कन्नी काटती नजर आई। ऐसे कई और मुद्दे रहे जिनकी वजह से 2022 के चुनाव याद रखा जाएगा। अमर उजाला ने ऐसे चुनावी मुद्दों और घटनाओं की पड़ताल की। पेश है


ये रिपोर्ट: भाजपा ने आखिर में चला ध्रुवीकरण का दांव
कोविड प्रोटोकॉल की बंदिशों से चुनाव जैसे-जैसे मुक्त होता गया, राजनीतिक दलों का प्रचार में भी आक्रामकता नजर आने लगी। वर्चुअल रैलियां, फिजिकल सभाओं में बदली और सियासी नेताओं की जुबान से नारों, मुद्दों और बयानों के तीर छूटने लगे। भाजपा ने आखिर में ध्रुवीकरण का दांव चला।

ये भी पढ़ें...Uttarakhand Assembly Election 2022 :  खत्म हुआ मतदान, किसकी बनेगी सरकार पूछ रही हर जुबान

मुस्लिम विवि के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, अमित शाह से लेकर पार्टी का शायद ही कोई केंद्रीय और प्रांतीय नेता रहा जिसने कांग्रेस को असहज करने की कोशिश नहीं की। लव जिहाद से लेकर लैंड जिहाद, हिजाब और आखिर में सीएम धामी का समान नागरिक संहिता का मुद्दा ध्रुवीकरण की सियासत का आखिरी दांव माना गया। 

कांग्रेस काटती रही कन्नी, तीन तिगाड़ा को बनाया हथियार
कांग्रेस रणनीतिक तरीके से इस मुद्दे से कन्नी काटती दिखी। पार्टी के चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हरीश रावत का बयान आया कि वह भाजपा की पिच पर नहीं खलेंगे बल्कि बेरोजगारी, महंगाई और अर्थव्यवस्था से जुड़े चुनावी मुद्दों की बात करेंगे। तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने के मुद्दे को कांग्रेस ने अपने चुनाव अभियान का सबसे धारदार हथियार बनाया। पार्टी ने तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा नारे और गाने से भाजपा को असहज करने की कोशिश की। 

थीम सांग्स की आई बाढ़, जुबिन ने भी गाए चुनावी गीत
2022 का विधानसभा चुनाव सियासी दलों और प्रत्याशियों के बनाए गए थीम सांग्स के लिए भी याद किया जाएगा। भाजपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी ने ही थीम सांग्स नहीं बनाए बल्कि प्रत्याशियों के समर्थन में भी सोशल मीडिया और प्रचार में जमकर गाने बजाए गए। मखमली आवाज के जादूगर जुबिन नौटियाल ने भी पार्टी के थीम सांग गाया और प्रधानमंत्री की कविता को आवाज दी। 

चुनावी चौसर पर सियासी दलों ने मोहरे फिट करने के लिए हाथी और वजीर सरीखे कद वाले नेताओं के अरमानों पर भी पानी फिर गया। दिग्गज नेता हरीश रावत रामनगर से सीट बदल कर उन्हें लालकुआं सीट पर उतार दिया गया। लालकुआं में घोषित प्रत्या शी का टिकट काटा गया तो वह बागी हो गई। 

दलबदलुओं की आ गई बहार
ये चुनाव दलबदल के लिए भी याद रखा जाएगा। धामी सरकार के कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य व हरक सिंह रावत कांग्रेस में चले गए। दोनों ही दलों में बदबदलुओं की बहार आ गई। सरिता आर्य और दुर्गेश्वर लाल, किशोर उपाध्याय इधर भाजपा में आए उधर पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बना दिया। उसी अंदाज में ओम गोपाल रावत और टिहरी विधायक धन सिंह नेगी ने भाजपा से बगावत की और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ गए।

खूब हुई बदजुबानी, सोशल मीडिया में चले तीर
चुनाव में जमकर बदजुबानी भी हुई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बारे में टिप्पणी की, जिस पर रावत ने कड़ा एतराज जताया। राहुल गांधी पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ऐसी टिप्पणी जिसे कांग्रेस बदजुबानी करार दिया। मतदान से ठीक पहले सोशल मीडिया पर वीडियो और ऑडियो के तीर चले। खटीमा से कांग्रेस प्रत्याशी भुवन कापड़ी का एक स्टिंग 
वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह खनन माफिया से बातचीत कर रहे हैं। 

पहली बार हरक सिंह चुनाव में नहीं
उत्तराखंड के चुनावी इतिहास में यह पहला चुनाव है जिसमें चर्चित नेता हरक सिंह रावत नजर नहीं आए। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्हें चौबट्टाखाल से मंत्री सतपाल महाराज के खिलाफ उतारे जाने की चर्चाएं भी हुईं। लेकिन कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया। ये अटकलें निर्मूल साबित हुईं कि कांग्रेस हरक सिंह से उनके प्रभाव वाली सीटों पर प्रचार कराएगी। हरक सिंह केवल लैंसडौन विस सीट पर अपनी पुत्र वधू का चुनाव लड़ाने तक सीमित रहे।

चैंपियन और कर्णवाल भी चुनावी नहीं लड़ पाए
अपने विवादित बयानों को लेकर चर्चाओं में रहने वाले विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन और देश राज कर्णवाल भी इस बार चुनाव नहीं लड़ पाए। एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी के कारण पार्टी को असहज करने वाले इन दोनों विधायकों का भाजपा ने टिकट काट दिया।
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