उत्तराखंडः शाह की ‘सियासत’ के आगे भाजपा की गुटबाजी फेल, भीतर सुलग रहा है असंतोष
- अपने-अपने खेमों तक सिमटी है संगठन और सरकार से नाराजगी
- खुलकर मोर्चा बंदी करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता है कोई गुट
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प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के भीतर नाराज और असंतुष्ट नेताओं व कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है, मगर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के आगे पार्टी का कोई खेमा खुलकर नाराजगी जताने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। नाराजगी और असंतोष के सुर अपने-अपने खेमों में सिमटे हैं। मानों सही समय आने के इंतजार में हों।
एक दौर में भाजपा के भीतर खेमेबाजी की तस्वीर एकदम स्पष्ट थी। पार्टी तीन ध्रुवों में बंटी थी। एक खेमा पूर्व मुख्यमंत्री जनरल बीसी खंडूड़ी का था, तो दूसरे की अगुवाई भगत सिंह कोश्यारी करते थे। तीसरा खेमा पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल निशंक का माना जाता था। पार्टी के भीतर जब-जब गुटबाजी सतह पर आई, मुख्यमंत्री तक बदल गए। लेकिन पार्टी के भीतर आज के समय के सियासी हालात अलग हैं।
वर्तमान में पार्टी की सियासत चार प्रमुख ध्रुवों के इर्द गिर्द संचालित हो रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत एक नया और प्रभावी ध्रुव माने जा रहे हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक अब भी भाजपा के बड़े पावर सेंटर हैं। प्रदेश अध्यक्ष व सांसद बनने के बाद अजय भट्ट ने भी खुद को एक क्षत्रप के तौर पर स्थापित किया है।
पार्टी के मजबूत केंद्रीय नेतृत्व के आगे नतमस्तक
अजय भट्ट के अलावा महाराष्ट्र का राज्यपाल बनने के बावजूद कोश्यारी प्रदेश में अपने खेमे के नेताओं और कार्यकर्ताओं की धूरी अब भी बने हुए हैं। कांग्रेस से भाजपा में आए पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की पहचान उन विधायकों और नेताओं के संरक्षक के तौर पर पार्टी में हैं, जिन्होंने उनके साथ कांग्रेस छोड़ी थी।
लेकिन यह सच्चाई है कि पार्टी में खुलकर नाराजगी या असंतोष जाहिर करने का साहस अब तक कोई क्षत्रप या खेमा नहीं कर पाया है। अलबत्ता पार्टी नेताओं या विधायकों के स्तर पर यदि कोई नाराजगी दिखाई देती है तो उनके खेमे के नेता भी उनके साथ खड़े होने से बचने का प्रयास करते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी का मजबूत केंद्रीय नेतृत्व है, जिसके आगे सारे गुट नतमस्तक हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने कोई भी गुट कुछ कहने की स्थिति में नहीं है।
भाजपा में खेमेबाजी बेशक सतह पर नजर नहीं आ रही है, लेकिन अंदर ही अंदर असंतोष सुलग रहा है। कई विधायकों में मंत्रिमंडल में विस्तार न होने को लेकर नाराजगी है तो कई पूर्व विधायक और वरिष्ठ नेता तीन साल गुजर जाने के बाद भी दायित्व न मिलने से नाराज हैं। हालांकि सरकार ने दायित्वों का पिटारा एक बार फिर खोला है, लेकिन अब भी नाराजगी कम नहीं है।