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शौचालय पर शर्म कब आएगी?
अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 06 Sep 2014 10:57 AM IST
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शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वस्थ विद्यालय, स्वस्थ भारत पुस्तिका का विमोचन किया। इस दौरान उन्होंने स्कूलों में बालिकाओं के लिए शौचालय नहीं होने पर चिंता जताई। देश के हर स्कूल में शौचालयों के निर्माण को पीएम ने अपनी प्राथमिकता करार दिया।
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बाद में देश भर के स्कूली बच्चों के साथ संवाद में भी पीएम ने बालिकाओं के लिए स्कूलों में अलग से शौचालय का जिक्र बार-बार किया, लेकिन ऐसी चिंता स्कूलों में व्यवस्था बनाने वालों में नहीं दिखती। मालूम नहीं ऐसे लोगों को शर्म कब आएगी?
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दर्द पर ओढ़ ली मासूमों ने शर्म
बेटियां पढ़ रही हैं और आगे भी बढ़ रही हैं, लेकिन स्कूलों में उनके लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। राजधानी के सरकारी स्कूलों में अमर उजाला ने जायजा लिया तो शर्मनाक सच सामने आ गया।
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अधिकतर स्कूलों में बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय नहीं हैं। यदि किसी स्कूल में हैं तो वहां ताला लगा है। छात्राओं को मजबूरन कॉमन वॉश रूम का इस्तेमाल करना पड़ता है।
नतीजतन अधिकतर छात्राओं ने स्कूल में रहने के दौरान ‘जरूरत’ को जज्ब करना सीख लिया है। शर्म और डर के चलते बच्चियां घंटों नेचर कॉल रोके रहने का दर्द झेलने को अभिशप्त हैं।
ऐसा है हाल
- चंदरनगर स्थित प्राथमिक विद्यालय रेस्ट कैंप में चार शौचालय बने हैं, लेकिन तीन पर ताला लटका है। एक ही शौचालय खुला रहता है, लेकिन छात्राओं के लिए अलग से वाशरूम की व्यवस्था नहीं है।
- राजकीय पूर्व माध्यमिक जूनियर हाईस्कूल रेस्ट कैंप में दो शौचालय हैं। एक शौचालय स्टाफ के लिए रिजर्व है, जबकि दूसरे में छात्र-छात्राओं को जाना होता है। शौचालय की स्थिति बदहाल है। दरवाजे की कुंडी टूटी है और सफाई कभी नहीं होती।
शिक्षकों का तर्क
अमर उजाला ने जब प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों से तीन शौचालय बंद होने और छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं होने के बारे में पूछा तो वे हड़बड़ाने लगे। एक शिक्षिका ने कहा कि बच्चे टायलेट गंदा कर देते हैं। जरूरत होने पर बाकी टायलेट खोले जाते हैं। छात्राओं के लिए अलग टायलेट के सवाल पर कहा कि ‘लड़के शौचालय का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते।’
बोली बच्चियां
हम कभी भी स्कूल के शौचालय का प्रयोग नहीं करते। तीन कक्षाओं के बच्चे एक ही शौचालय में जाते हैं। लड़कों के साथ वहीं पर खड़े रहने में शर्म आती है।
-गौरी, रापूमा जूनियर हाईस्कूल
शायद ही कोई लड़की स्कूल के शौचालय का इस्तेमाल करती है। शौचालय के दरवाजे पर कुंडी भी नहीं है। इसलिए जाने में डर लगता है।
-पूजा, रापूमा जूनियर हाईस्कूल
एक ही शौचालय होने से लाइन लग जाती है। दरवाजा बंद नहीं होता, कई बार शर्मिंदा होने की स्थिति बन जाती थी। इसलिए हमने जाना छोड़ दिया।
-रूबी, रापूमा जूनियर हाईस्कूल
प्राइमरी और जूनियर को मिलाकर रेस्ट कैंप में छह शौचालय हैं। इनमें से एक भी अगर शिक्षकों के लिए मान लिया जाए तो बाकी पांच खुले रहने चाहिए। बालिकाओं के लिए अलग से व्यवस्था होनी चाहिए। ताले किसने लगाए हैं, यह देखा जाएगा।
-इंद्रमणि बलोदी, नगर शिक्षा अधिकारी
डाक्टरों की राय
लंबे समय तक नेचर कॉल को रोकना ठीक नहीं है। इससे पढ़ाई में मन न लगना, तनाव, माइग्रेन और ब्लड प्रेशर संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं, किडनी संबंधी रोग होने की भी आशंका रहती है। बच्चों के लिए यह किसी भी रूप में ठीक नहीं माना जा सकता।
-डा. हरीश बसेरा, सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट
अगर कोई लगातार लंबे समय तक प्रेशर रोकता है तो इससे कई तरह की क्रोनिक प्रॉब्लम आ सकती है। छोटी उम्र की बच्चियां अगर ऐसा कर रही हैं तो यह ठीक नहीं है। दिल, दिमाग और किडनी संबंधी रोगों के लिहाज से ऐसा करना खतरनाक हो सकता है।
-डा. एसडी जोशी, सीनियर फिजीशियन