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...ये था केदारनाथ में तबाही का असली कारण

Wed, 20 Nov 2013 11:06 AM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 20 Nov 2013 11:06 AM IST
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the true reason of uttarakhand disaster

उत्तराखंड में 16-17 जून की तबाही को बढ़ाने में बांध और सड़कों का भी खासा योगदान रहा। केदारघाटी में तबाही के कारणों की पड़ताल से अब यह भी उभरकर सामने आ रहा है।

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बांध और सड़क निर्माण ने आपदा को बढ़ाया
अलकनंदा में व्यापक पैमाने पर बांध और सड़क निर्माण होने ने आपदा की भयावहता को बढ़ा दिया। 16-17 जून की बाढ़ ने नदी पर बड़े पैमाने पर बन रही जल विद्युत परियोजनाओं पर भी सवाल खड़े किए थे। हालांकि विशेषज्ञों का एक धड़ा यह मानने को तैयार नहीं है।
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दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ इस पर साफ-साफ कहने लगे हैं कि आपदा की भयावहता को बढ़ाने में बांधों का भी हाथ रहा। अलकनंदा में बाढ़ों के इतिहास की गहरी समझ रखने वाले डॉ. नवीन जुयाल ने इस मुद्दे को फिर से उठाया है। डॉ. जुयाल ने हाल ही में करंट साइंस में लिखे गए एक लेख में स्पष्ट किया है कि 16-17 जून की यह बाढ़ पिछले छह सौ सालों का रिकॉर्ड तोड़ गई।

नदी में व्यापक पैमाने पर निर्माण कार्य
नदी में इतना मलबा आया कहां से, इस बात की पड़ताल करने पर तस्वीर कुछ हद तक साफ हो जाती है। नदी में व्यापक पैमाने पर निर्माण कार्य जारी रहे। यह तब हुआ जब कि इस नदी में बरसात के बाद प्राकृतिक रूप से बांध बनने से बाढ़ आने का इतिहास रहा है। ऐसे में 16-17 जून को भारी बरसात के बाद नदी में मलबा इस बाढ़ की विभीषिका को बढ़ाने वाला ही साबित हुआ।

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पीएसआई के संस्थापक निदेशक रवि चोपड़ा के मुताबिक इस बात की भी पड़ताल की जा रही है। रवि चोपड़ा सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बांध और बाढ़ केबीच संबंध की पड़ताल करने केलिए बनी कमेटी के अध्यक्ष हैं। कमेटी की दिल्ली में 15 नवंबर को बैठक हुई थी और इस बैठक में डॉ. नवीन जुयाल ने यह तथ्य भी पेश किए थे।

26 अगस्त 1894
यह बाढ़ अलकनंदा में उस समय आई जब अलकनंदा में पेड़ों की कटान दूर-दूर तक नहीं थी। अलकनंदा में यह बाढ़ अलकनंदा की सहायक नदी में भूस्खलन के कारण झील बनने के कारण आई थी। सितंबर 1893 में अलकनंदा की सहायक बिरही में पहाड़ टूटकर गिरने से झील बन गई थी। यह अनुमान लगा लिया गया था कि इस झील को भरने में करीब एक साल लेगा।

इस स्थिति को देखते हुए अगस्त 1894 में श्रीनगर और हरिद्वार के बीच केपुलों को पहले से ही खोल कर हटा लिया गया था। 26 अगस्त को झील के टूटने से बाढ़ आई पर पहले से ही सचते रहने के कारण किसी की जान नहीं गई।

20 जुलाई 1970
यह बाढ़ भी अलकनंदा की सहायक बिरही नदी में जोशीमठ और चमोली के बीच बादल फटने के कारण आईं। इस बार मानसून के बीच में बादल फटने के कारण यह बाढ़ आई थी लिहाजा इस बार किसी को संभलने का मौका नहीं मिला। इस बाढ़ में बेलाकृची के पास तीस बसें बह गई थीं। करीब 13 पुल इस बाढ़ का शिकार बने।


श्रीनगर का निचला हिस्सा इस बाढ़ से बिलकुल ही तबाह हो गया था। इस बाढ़ के पीछे एक बढ़ा कारण व्यापक पैमाने पर अलकनंदा नदी घटी क्षेत्र में पेड़ों का कटान भी माना गया।

क्या रहे इस बार की बाढ़ की विभीषिका के कारण
1894 और 1970 में आई बाढ़ के क्षेत्र में फिर से बसावट हुई। नदी क्षेत्र में निर्माण के अलावा केदारनाथ में भी कोई हिस्सा नहीं छोड़ा गया। इससे नदी का प्राकृतिक बहाव बाधित हुआ।

सड़क और बांधों का व्यापक निर्माण भी इसका एक कारण रहा। 2000 से लेकर 2012 तक इस क्षेत्र में करीब 11 हजार किलोमीटर सड़क बनी। करीब 45 बांध बनाए जा चुके थे और 119 बांध या तो निर्माणाधीन थे या फिर प्रस्तावित थे।

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