{"_id":"62e827bfca64860506620f83","slug":"the-discipline-of-the-disciplined-force-is-giving-the-answer-again-and-again-city-news-drn418861556","type":"story","status":"publish","title_hn":"Uttarakhand Police: अनुशासित बल का तमगा, फिर भी अनुशासन बार-बार दे रहा जवाब","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Uttarakhand Police: अनुशासित बल का तमगा, फिर भी अनुशासन बार-बार दे रहा जवाब
Tue, 02 Aug 2022 05:51 PM IST
देहरादून ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: देहरादून ब्यूरो
Updated Tue, 02 Aug 2022 05:51 PM IST
सार
2021 की शुरुआत में जब कोरोना की पहली लहर लगभग शांत हो चुकी थी, उस दौरान वर्ष 2001 बैच के सिपाहियों को निर्धारित समयसीमा के अनुसार 20 साल हो रहे थे।
विज्ञापन
उत्तराखंड पुलिस
- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
विस्तार
ग्रेड पे मामले में अनुशासित बल का अनुशासन भी बार-बार जवाब दे रहा है। एक बार फिर उठी आंदोलन की चिंगारी आग में बदलेगी या बुझेगी, यह पुलिस अधिकारियों के मैनेजमेंट पर निर्भर करेगा। अब तक की स्थिति देखकर लगता है कि पुलिस मुख्यालय के माइक्रो मैनेजमेंट को भी भनक नहीं लग पा रही है। चेतावनी के बाद आंदोलन और फिर शुरू होता है मान-मनौव्वल का दौर। इस बार भी कुछ परिजनों को मनाया गया है, लेकिन आगे क्या होगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।
विज्ञापन
दरअसल, 2021 की शुरुआत में जब कोरोना की पहली लहर लगभग शांत हो चुकी थी, उस दौरान वर्ष 2001 बैच के सिपाहियों को निर्धारित समयसीमा के अनुसार 20 साल हो रहे थे। सरकार की ओर से इस तरह का कोई इशारा नहीं मिल रहा था कि उन्हें निर्धारित 4600 ग्रेड पे मिलेगा या नहीं। इस पर सिपाहियों ने चुपके से सोशल मीडिया पर अपनी मांग को उठाना शुरू कर दिया था। माना जाने लगा कि यह फिर से विद्रोह का रूप से ले सकता है। इससे पहले वर्ष 2015 में उत्तराखंड पुलिस इस तरह की स्थिति का सामना कर चुकी थी। हालांकि, अधिकारियों ने इस आंदोलन को दबा दिया था।
विज्ञापन
इसके बाद फिर से आंदोलन की सुगबुगाहट हुई। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान विभिन्न जगहों पर ड्यूटी कर रहे सिपाहियों ने काला मास्क लगाकर आंदोलन का ट्रेलर दिया। महकमा फिर से हरकत में आया और चेतावनी जारी कर दी गई। कुछ दिनों तक शांति रही, लेकिन मई 2021 में सिपाहियों के परिजन मैदान में आ गए। पहले छोटे आंदोलन हुए तो पुलिस अधिकारियों ने भी इसे हल्के में लिया। इसके बाद सिपाहियों के परिजनों ने अगस्त 2021 में पुलिस मैनेजमेंट की परीक्षा ली। वे कूच करते हुए मुख्यमंत्री आवास जाने की कोशिश करने लगे। देर रात तक आंदोलन चला और पुलिस के मुखिया के आश्वासन पर ही आंदोलनकारी हटे।
विज्ञापन
मुख्यमंत्री ने अक्तूबर 2021 में ग्रेड पे की घोषणा की तो लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा, लेकिन दो महीने तक शासनादेश नहीं हुआ। इसके बाद 31 दिसंबर को कैबिनेट बैठक में विचार करने की बात हुई। सात जनवरी 2022 को शासनादेश हुआ तो वह एकमुश्त दो लाख रुपये दिए जाने संबंधी, मगर यह भी उन्हें मंजूर नहीं था। फिर शुरू हुआ इस्तीफों का दौर तो सिपाहियों पर कार्रवाई की गई। कुछ महीनों से सब ठीक चल रहा था। इसी बीच सिपाहियों के परिजनों ने एक बार फिर चेतावनी दी तो अधिकारियों के कान खड़े हो गए। अब परिजनों के आंदोलन को भी अनुशासनहीनता से जोड़कर ही देखा जा रहा है। पुलिस विभाग तो समझाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन गेंद सरकार के पाले में है। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि यह आंदोलन बड़ा रूप लेगा या फिर यहीं दब जाएगा।
पुलिस का रुख इस मामले में पहले से साफ है। अनुशासित बल में अनुशासनहीनता बरदाश्त नहीं की जाएगी। पुलिस सिपाहियों को चाहिए कि वे नियमानुसार अपनी मांग को रखें। जो सरकार का फैसला होगा, उसी के आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी।
- अशोक कुमार, डीजीपी, उत्तराखंड