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तेजी से मायावती के सगे हो गए थे सुरेंद्र राकेश
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 08 Feb 2015 02:49 PM IST
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जिंदगी के आखिरी क्षणों तक बसपा से निलंबित रहे कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र राकेश ने पार्टी में बुलंदी की सीढ़ियां तेजी से चढ़ी थीं। वैसे तो कांग्रेस से बसपा में वे टिकट की शर्त पर आए थे, लेकिन तेजी से हाईकमान के सगे हो गए।
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विधानसभा चुनाव वर्ष 2012 में प्रचार के लिए आईं बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें आशीर्वाद दिया था। हालांकि, बाद में उनपर पार्टी की नीतियों के खिलाफ जाने के आरोप लगे और उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया।
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बसपा के जीएमएस रोड स्थित प्रदेश कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में पार्टी के मौजूदा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड प्रभारी राम अचल राजभर ने सुरेंद्र राकेश को वर्ष 2007 में पार्टी में शामिल किया था।
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उस वक्त सुरेंद्र राकेश सैकड़ों समर्थकों के साथ बसपा में शामिल हुए थे। इसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में उनकी पकड़ बनती गई। उन्हें वरिष्ठ नेता मोहम्मद लईक अहमद खान समेत कई क्षेत्रीय नेताओं को बसपा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था।
कामकाज में भी तेज तर्रार थे
परिवहन और समाज कल्याण मंत्री सुरेंद्र राकेश केवल तेवरों से ही नहीं बल्कि विभागीय कामकाज में भी तेज तर्रार थे। उन्होंने लीक से हटकर कई ऐसे काम किए जो कोई और कैबिनेट मंत्री नहीं कर पाया।
मंत्रिमंडल की बैठकों में वह अपने विभागों के प्रस्तावों पर हामी भरवाने में माहिर थे। उनके समय में अनुसूचित जाति जनजाति उपयोजना अधिनियम लागू करने वाला उत्तराखंड देश का दूसरा प्रदेश बना। अधिनियम लागू होने से अनुसूचित जाति जनजाति योजनाओं के लिए कुल बजट का 21 फीसदी खर्च करने का प्रावधान मिला।
उन्होंने परिवहन विभाग को बेहतर बनाने के लिए कई प्रयोग भी किए, जिनमें से कुछ सफल रहे। परिवहन मंत्री के तौर पर सुरेंद्र राकेश ने सार्वजनिक यातायात को बेहतर बनाने के लिए देहरादून के लिए नया सिटी बस प्लान तैयार करवाया, लेकिन उनकी बीमारी के चलते योजना टलती रही। पीपीपी मोड में बस टर्मिनल के साथ व्यवसायिक भवन बनाने की योजना अभी प्रक्रिया में है।
ई-टिकटिंग प्रणाली लागू करने पर शासन की टेंडर प्रक्रिया को निरस्त करवाया। मंत्री ने आरटीओ कार्यालय देहरादून को स्थानांतरित करने के लिए शासन की कवायद को रोक दिया। कई विभागीय प्रकरणों की उन्होंने जांच तक बैठाई जो अधिकारियों को रास नहीं आई।
विवादों के डर से नहीं हटे पीछे
सुरेंद्र राकेश की कार्यशैली के साथ विवाद भी जुड़े रहे, लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। उनका आस्ट्रेलिया में सार्वजनिक परिवहन का टूर विवादों में रहा, लेकिन वह पहले कैबिनेट मंत्री थे, जिन्होंने टूर से लौटने के बाद उत्तराखंड के परिपेक्ष में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने की विस्तृत रिपोर्ट रखी।
आरटीओ में दलालों की सक्रियता को लेकर चलाए अभियान में खुद छापे मारे। उन्होंने विवादों के बावजूद परिवहन निगम के प्रबंधन बोर्ड के चेयरमैन का पद नहीं भरा। वह मानते थे कि मंत्री को इसका चेयरमैन होना चाहिए। हालांकि उनकी बीमारी के चलते यह प्रक्रिया अधूरी रही।
कई योजनाएं मंत्री की पहल का नतीजा
रात को शहर में यातायात सुलभ बनाने के लिए परिवहन मंत्री ने देहरादून में नाइट सिटी बस सेवा संचालित करवाई, लेकिन कुछ समय बाद विभाग ने यात्री नहीं मिलने का हवाला देकर इसे बंद कर दिया।
सस्ती दरों पर सार्वजनिक यातायात के तहत एसी बसों को लांच किया। उन्होंने वाल्वो बसों का बेड़ा बढ़ाया, जिससे राजस्व बढ़ा। एंट्री टैक्स वसूली की नियमावली को प्रभावी किया। ईंधन की बचत को निगम के ड्राइवरों की ट्रेनिंग शुरू करवाई।