आपको 'हैरत' में डाल देंगी ये बेटियां
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यह बिटिया जब रोज सुबह उठती है तो अन्य बच्चों की तरह स्कूल जाकर भविष्य के सपने बुनने के ख्वाब उसकी आंखों में नहीं होते हैं। खेलने कूदने का समय भी उसके पास नहीं है।
दिन चढ़ने के साथ ही वह अपना और परिवार के पेट के लिए जूझने लगती है। बिटिया छोटी सी उम्र में परिवार को मुसीबतों से उबारने की भरकश कोशिश में जुटी है। नाम है सोनिया, काम है रस्सी के सहारे जोखिमभरे करतब दिखाकर दो जून की रोटी जुटाना।
विरासत में मिली नट परंपरा
जिस उम्र में बच्चे माता-पिता की उंगलियां पकड़कर चलना सीखते हैं, उस दहलीज पर बेटी जोखिम भरा खेल दिखाकर परिवार के लिए खेवनहार बनी है। सोनिया ने न सिर्फ उसे विरासत में मिली नट परंपरा को जिंदा रखा है, बल्कि इससे होने वाली आमदनी से परिवार का भरण-पोषण भी कर रही है।
मूलरूप से रायपुर, छत्तीसगढ़ निवासी परिवार पिछले एक महीने से ऋषिकेश में जगह-जगह सड़क किनारे, सार्वजनिक स्थानों पर करतब दिखा रहा है। परिवार में सोनिया के माता-पिता और एक साल की छोटी बहन है। उसके पिता अर्जुन सिंह ने बताया कि नट दिखाना उनका खानदानी पेशा है।
एक दौर ऐसा आया जब परिवार में व्यवसाय को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं था, भरण-पोषण के लिए भी परिवार मोहताज हो चुका था। बताया कि उस वक्त सोनिया तीन साल की थी, विपरीत परिस्थितियों में बेटी ने परंपरा की बागडोर संभाली और रस्सी पर करतब दिखाना शुरू किया।
जान पर खेलकर बचाई जान
ऋषिकेश में गृह कलेश के चलते जिंदगी से हताश हुई एक महिला जान देने के इरादे से गंगा में कूद गई। मौसी को बचाने के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना बेटी ने भी नदी में छलांग लगा दी।
बेटी के जज्बे को सलाम
कुछ ही देरी बहादुर बिटिया मौसी को सकुशल बचाकर पानी से बाहर ले आई। जांबाज बेटी के जज्बे को सभी ने सलाम किया। घटना शनिवार शाम पशुलोक बैराज क्षेत्र की है। यहां बीस बीघा, बापूग्राम निवासी आरती राणा (26) ने पति अरुण को शराब पीने से मना किया, लेकिन वह नहीं माना।
इससे क्षुब्ध होकर आरती घर से भागकर पशुलोक बैराज कॉलोनी की ओर आई और यहां गंगा में कूद गई। मौसी के इरादे भांपकर पीछे-पीछे आ रही भतीजी सुशीला (16) ने मौसी को गंगा में डूबते देखा तो उसने जान की परवाह किए बिना नदी में छलांग लगा दी।
बर्फीले पानी से जूझते हुए सुशीला काफी मशक्कत के बाद मौसी का पानी से सकुशल बाहर निकाल लाई। मौसी के अचेत होने पर उसने चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया। शोर सुनकर नदी किनारे सिंचाई विभाग के क्वाटर से एक व्यक्ति बाहर आया।
हालत खतरे से बाहर
घटनाक्रम की जानकारी लेने के बाद उसने पुलिस को सूचित किया। मौके पर पहुंची पुलिस ने 108 की सहायता से अचेत आरती को राजकीय चिकित्सालय में भर्ती कराया। जहां चिकित्सकों ने उसकी हालत खतरे से बाहर बताई। अस्पताल में भीगने से कांप रही सुशीला की हिम्मत पर स्वास्थ्य कर्मियों और पुलिस ने खूब सराहना की।
बेटी की कामना में रखा व्रत
राजधानी देहरादून में शनिवार को पुत्रदा एकादशी मनाई गई। महिलाओं ने पुत्र की कामना के साथ व्रत रखा। शाम के वक्त कथा सुनकर, ईश्वर को भोग लगा व्रत को संपन्न किया। कहा जाता है कि यह व्रत करने से पुत्र की प्राप्ति होती है।
बदल रही है लोगों की मानसिकता
लेकिन कई महिलाओं ने पुत्री की कामना के साथ व्रत रखा। उनका कहना था कि व्रत के माध्यम से उन्होंने संतान के स्वस्थ होने की कामना भी की। टपकेश्वर महादेव मंदिर स्थित श्री वैष्णो देवी गुफा मंदिर के आचार्य विपिन जोशी का कहना है कि अब लोगों की मानसिकता बदल रही है।
अमूमन यह व्रत पुत्र प्राप्ति के लिए रखा जाता है, लेकिन ऐसे भी लोग हैं, जो पुत्री या स्वस्थ संतान की कामना के लिए व्रत रखते हैं। इसके अलावा सुगुण युक्त संतान के लिए भी यह व्रत रखा जाता है। इस व्रत का बड़ा महात्म्य है।
एक और बच्ची के लिए व्रत
मयूर शाही और उनकी पत्नी नीति की शादी को तीन साल हो चुके हैं। मयूर बैंक में कार्यरत हैं, उनकी पत्नी नीति पढ़ाती हैं। उनकी लगभग डेढ़ साल की एक बच्ची मिष्टी है। इसके बावजूद वह एक और बच्ची चाहते हैं।
नीति शाही ने इसके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। नीति कहती हैं कि बेटी तो जन्मदात्री है। उसके बगैर दुनिया की कल्पना कैसी।
यह है कथा
कथा के अनुसार प्राचीन समय में भद्रावती नामक नगरी में सुकेतुमान नामक राजा राज्य करता था। उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण से सुकेतुमान और उनकी पत्नी शैव्या परेशान रहते थे। किसी के सुझाने पर शैव्या ने पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। इस व्रत से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि जो भी स्त्री विधि-विधान से इस व्रत को करती है, उसे तपस्वी, कीर्तिवान पुत्र की प्राप्ति होती है।
स्वामी विवेकानंद भी चाहते थे बढ़ें बेटियां
भारतीय दर्शन का विश्व भर में प्रचार करने वाले स्वामी विवेकानंद भी चाहते थे कि बेटियां आगे बढ़ें। संदेश साफ था वह आगे बढ़ेंगी तभी तो दुनिया बची रहेगी।
शारदा गर्ल्स एजुकेशन फंड
शायद यही वजह थी कि 1897 में अपने दून प्रवास के दौरान गुरुभाई तुरियानंद संग उन्होंने देवभूमि में अनाथालय खोलने की योजना बनाई थी। वह तो नहीं खुला, लेकिन उनकी गुरुमाता के नाम पर अब शारदा गर्ल्स एजुकेशन फंड जरूर चलाया जा रहा है, जो बेटियों को शिक्षित करने का काम कर रहा है।
किशनपुर स्थित रामकृष्ण मिशन के आश्रम की लाइब्रेरी में मौजूद साहित्य में स्वामी विवेकानंद की इस मंशा के बाबत साफ-साफ लिखा है। स्वामी विवेकानंद मानते थे कि एक महिला अगर शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है।
बालिका शिक्षा के भी वह प्रबल समर्थक थे। यही वजह है कि स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती पर रामकृष्ण मिशन की ओर से मलिन बस्ती की बालिकाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य के लिए भी विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
इसमें काठबंगला बस्ती, वीर गबर सिंह बस्ती आदि क्षेत्रों से लड़कियां आकर न केवल शिक्षा पा रही हैं, बल्कि कढ़ाई, बुनाई जैसे कार्यों को सीख आत्म निर्भर भी बन रही हैं।
मेहनत से पाया इन बेटियों ने मुकाम
न घरवालों का सपोर्ट, न सुविधा इसके बावजूद हरियाणा की नेहा ने आज वॉलीबाल में अपना अलग मुकाम बना लिया है। नेहा की लगन देख आज घरवाले और सरकार दोनों उसके साथ हैं। इसी टीम में शामिल निर्मल कंवर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक जलवा बिखेर रही हैं।
तुरुप का इक्का साबित हुई ये बेटियां
दोनों खिलाड़ी दून में चल रही चैंपियनशिप में केरल और उत्तर प्रदेश को सबसे कड़ा प्रतिद्वंद्वी मान रही हैं। 40वीं जूनियर नेशनल वालीबाल चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में जगह बना चुकी हरियाणा की टीम की जीत के सफर में नेहा और निर्मल कंवर तुरुप का इक्का साबित हुई हैं।
एक के तेज प्रहारों का विपक्षी टीमें अभी तक काट नहीं ढूंढ सकी हैं, तो दूसरी शांत होकर दिमाग का खेल खेलने में माहिर है। दोनों का साथ पाकर साथी खिलाड़ी भी प्रेरित होते हैं। एशियन चैंपियनशिप में खेल चुकी नेहा बताती हैं कि उनका यहां तक का सफर आसान नहीं था।
परिवार का सहयोग नहीं
शुरू से ही खेलने का शौक था, लेकिन घर से पूरा सपोर्ट नहीं मिलता था। अपनी जिद के कारण नेशनल खेलने गई तो वहां नेहा के खेल को देखकर घर और राज्य सरकार से भी सहयोग मिलना शुरू हुआ। वहीं निर्मल कंवर को बचपन से ही परिवार का पूरा सहयोग मिला है।
निर्मल ने बताया कि वे स्कूली समय से ही खेलती आ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलकर काफी कुछ सीखने को मिला। निर्मल का कहना है कि सभी अंतरराष्ट्रीय मैच इंडोर होते हैं, लेकिन यहां खिलाड़ी ओपन कोर्ट में खेलते और सीखते हैं। इस कारण तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। फिर भी टीम को जीत का पूरा भरोसा है।