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सामरिक सड़कों की सुस्त रफ्तार, डेडलाइन से पीछे स्वीकृत सड़कें
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 06 Jun 2016 02:19 PM IST
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- फोटो : फाइल फोटो
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उत्तराखंड से सटी चीन सीमा तक सेना की आवाजाही तेज करने के लिए सामरिक महत्व की सड़कों के निर्माण की रफ्तार काफी धीमी है। इसे लेकर सेना जहां परेशान है वहीं केंद्र सरकार चिंतित है।
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यही वजह है कि इसके निर्माण की तेज गति में बाधक बन रही केंद्र के वन (संरक्षण) एक्ट में वन विभाग और भूमि अधिग्रहण में विशेष राहत के संशोधन भी दिए गए। पर सीमांत सड़कों के निर्माण ने गति नहीं पकड़ी। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों की बार्डर रोड के लिए गठित इम्पावर कमेटी को निर्माण संबंधी दिक्कतों के जल्द समाधान के निर्देश दिए हैं।
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सीमांत क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण की रफ्तार अकेले उत्तराखंड में ही धीमी नहीं है, बल्कि देश भर में इस अवधि में स्वीकृत 198 अन्य सीमांत सड़कों का भी यही हाल है। पर अब केंद्र सरकार की सक्रियता से इसमें तेजी आने की संभावना जगी है। बात की जाए सीमांत क्षेत्रों की तो सैन्य आवाजाही को बेहतर बनाने के लिए बार्डर रोड आर्गेनाइजेशन (बीआरओ) इन सड़कों का निर्माण कर रही है।
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जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के बाद सर्वाधिक सड़क मार्ग उत्तराखंड में ही निर्मित किए जा रहे हैं। उत्तराखंड के जनपद पिथौरागढ़, उत्तरकाशी और चमोली में सीमा के पास सामरिक महत्व के मार्गों का निर्माण, चौड़ीकरण और पक्की करने का कार्य चल रहा है। सीमा पर 710 किलोमीटर लंबा सड़कों का जाल तैयार करना है। बेहद विषम परिस्थितियों और विपरीत मौसम के बावजूद अब तक बीआरओ ने राज्य में 370 किलोमीटर लंबी नौ सड़कें वर्ष 2014 तक पूरी कर लीं थी।
यह आ रही दिक्कतें
प्रदेश में सीमांत सड़क निर्माण को लेकर धीमी रफ्तार का कारण निर्माण संस्था बीआरओ को स्टोन क्रेशर के साथ हार्ट मिक्सिंग प्लांट और रोड़ी पत्थर की उपलब्धता नहीं होने से आ रही है। अति दुर्गम क्षेत्रों में होने वाले सड़क निर्माण के लिए सेना ने स्टोन क्रशर लगाने की अनुमति मांगी है, लेकिन सैद्धांतिक सहमति के बाद भी मामला शासन में विचाराधीन है।
चीन सीमावर्ती राज्य के टारगेट
जम्मू कश्मीर में 70 सड़कें
अरुणाचल प्रदेश में 48 सड़कें
उत्तराखंड में 17 सड़कें
सिक्कम में 12 सड़कें
हिमाचल प्रदेश में चार सड़कें