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Dehradun Crime: प्राचीन टपकेश्वर महादेव मंदिर से चांदी का नाग चोरी, एक संदिग्ध को किया गया पुलिस के हवाले

Tue, 30 Sep 2025 01:17 PM IST
रेनू सकलानी अवनीश चौधरी, माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून
अवनीश चौधरी, माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Tue, 30 Sep 2025 01:17 PM IST
सार

प्राचीन टपकेश्वर महादेव मंदिर से चांदी का नाग चोरी हो गया। चांदी का नाग भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित था। एक संदिग्ध को मंदिर सदस्यों ने पुलिस के हवाले किया है।

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Silver snake stolen from ancient Tapkeshwar Mahadev temple Dehradun Uttarakhand Crime News
प्राचीन टपकेश्वर महादेव मंदिर: भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित चांदी का नाग चोरी - फोटो : माई सिटी रिपोर्टर

विस्तार

देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित प्राचीन और ऐतिहासिक टपकेश्वर महादेव मंदिर में बीते रविवार भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित चांदी का नाग किसी अज्ञात ने चुरा लिया।

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मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों ने इस चोरी को मात्र एक भौतिक क्षति नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और धार्मिक भावना पर चोट बताया है। चांदी का नाग करीब 200 ग्राम वजनी था।
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घटना के संबंध में श्री टपकेश्वर महादेव सेवादल (रजिं.) के कार्यकारिणी सदस्य अनुभव अग्रवाल ने कैंट थाने में सोमवार को लिखित शिकायत दी। उन्होंने अमर उजाला को बताया कि चोरी की घटना के बाद मंदिर सेवा दल ने सीसीटीवी से चोर का पता लगाने की कोशिश की। सोमवार को एक शख्स को चोरी के शक में पकड़ा और पुलिस के हवाले किया।
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कैंट थानाध्यक्ष केसी भट्ट ने बताया कि जिस शख्स को मंदिर समिति ने पुलिस के हवाले किया है, वह संदिग्ध है। उसकी जांच की जा रही है। चोरी के संबंध में सोमवार को मुकदमा दर्ज कर लिया है। भगवान शिव के मस्तक से नाग चोरी करने वाले की तलाश और रिकवरी के लिए टीम गठित की गई है। पुलिस की कोशिश है कि जल्द से जल्द आरोपी को गिरफ्तार करने के साथ चांदी के नाग देव को फिर से भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित किया जाए। 

 

टपकेश्वर महादेव मंदिर

यह मंदिर न केवल देहरादून बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जिसका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। मंदिर लगभग 6000 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है और एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है, जिसे द्रोण गुफा के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य ने इसी स्थान पर तपस्या की थी।

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एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा जब दूध के लिए रो रहे थे, तब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गुफा की छत से दूध की धारा प्रवाहित की थी। इसी कारण इस शिवलिंग को पहले दूधेश्वर महादेव' के नाम से भी जाना जाता था। कलियुग में दूध की धारा जल में परिवर्तित हो गई, जो आज भी चट्टान से बूंद-बूंद करके शिवलिंग पर टपककर जलाभिषेक करती है। इसलिए यह जगह टपकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है।

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