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नुणाई मेले में दिखे लोक संस्कृति के रंग
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मानथात में आयोजित नुणाई मेले में उमड़े लोग।
- फोटो : VIKAS NAGAR
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लाखामंडल क्षेत्र के भटाड़ मानथात में मंगलवार को आयोजित नुणाई मेले में लोक संस्कृति की मनमोहक छटा देखने को मिली। सैकड़ों की संख्या में लोगों ने पारंपरिक गीतों पर सामूहिक रूप से झैंता, रासो और पांडव नृत्य की प्रस्तुति दी। हरे भरे मैदान के बीच में लगे स्टॉलों में लोगों ने जमकर खरीददारी की। देर शाम तक मेले की रंगत बनी रही। इससे पूर्व लोगों ने कुल देवता की पूजा-अर्चना कर मन्नत मांगी।
हर साल भटाड़ मानथात में सावन महीने में नुणाई पर्व का आयोजन किया जाता है। इस मेले में खत बौंदूर के 24 गांव के लोग हिस्सा लेते हैं। साथ ही गढ़वाल, हिमाचल प्रदेेश, जौनपुर क्षेत्र से भी लोग मेले में प्रतिभाग करने आते हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि पूर्व में संसाधनों के अभाव में ग्रीष्मकाल शुरू होते ही स्थानीय लोग अपने मवेशियों को चराने के लिए डांडा अणयाति, खंडबा बुुग्याल की तरफ चले जाते थे, जो सावन मास में वापस लौटते थे। उन्हीं भेड़ पालकों के लौटने की खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है, लेकिन अब यह त्योहार संस्कृति का एक हिस्सा बन गया है।
इस मौके पर ग्रामीण आटे और गुड़ से रोट तैयार करते हैं। इस रोट को स्थानीय भाषा से सेरूवा कहते हैं। स्थानीय निवासी 75 वर्षीय वीर सिंह चौहान ने बताया कि आटे और गुड़ से बने सैरूवा को काट कर सबसे पहले भेड़ पालकों को खिलाया जाता था। अजब सिंह, वीरेंद्र पंवार, सरदार सिंह पंवार, रजनीश पंवार आदि का कहना है कि अब यह मेला पलायन रोकने का एक जरिया भी बन गया है। इस मेले में हिस्सा लेने के लिए सुहागिन महिलाएं भी गांव आती हैं।
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हर साल भटाड़ मानथात में सावन महीने में नुणाई पर्व का आयोजन किया जाता है। इस मेले में खत बौंदूर के 24 गांव के लोग हिस्सा लेते हैं। साथ ही गढ़वाल, हिमाचल प्रदेेश, जौनपुर क्षेत्र से भी लोग मेले में प्रतिभाग करने आते हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि पूर्व में संसाधनों के अभाव में ग्रीष्मकाल शुरू होते ही स्थानीय लोग अपने मवेशियों को चराने के लिए डांडा अणयाति, खंडबा बुुग्याल की तरफ चले जाते थे, जो सावन मास में वापस लौटते थे। उन्हीं भेड़ पालकों के लौटने की खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है, लेकिन अब यह त्योहार संस्कृति का एक हिस्सा बन गया है।
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इस मौके पर ग्रामीण आटे और गुड़ से रोट तैयार करते हैं। इस रोट को स्थानीय भाषा से सेरूवा कहते हैं। स्थानीय निवासी 75 वर्षीय वीर सिंह चौहान ने बताया कि आटे और गुड़ से बने सैरूवा को काट कर सबसे पहले भेड़ पालकों को खिलाया जाता था। अजब सिंह, वीरेंद्र पंवार, सरदार सिंह पंवार, रजनीश पंवार आदि का कहना है कि अब यह मेला पलायन रोकने का एक जरिया भी बन गया है। इस मेले में हिस्सा लेने के लिए सुहागिन महिलाएं भी गांव आती हैं।
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