संत-शिष्या हत्याकांड: 10 साल बाद तीन हत्यारों को उम्रकैद, ऐसे उतारा था दोनों को मौत के घाट
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सहसपुर क्षेत्र के रामपुर स्थित समर्पण आश्रम में लूट के बाद संत व उनकी शिष्या की हत्या करने वालों को अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अपर जिला न्यायाधीश प्रथम आरके खुल्बे की अदालत ने दोषियों पर अलग-अलग धाराओं में कुल सात हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। दोषियों को सोमवार को अदालत से ही गिरफ्तार कर सुद्धोवाला जेल भेज दिया गया।
सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता जया ठाकुर ने बताया कि 20 अगस्त 2008 को सहसपुर के रामपुर स्थित समर्पण आश्रम के अध्यक्ष फादर एलबन मेन्डोका ने एफआईआर दर्ज कराई थी। घटनाक्रम के अनुसार समर्पण आश्रम के संत स्वामी अरतेय उर्फ अस्ते फादर सैमवेल और उनकी शिष्या मर्सी दो दिन से आश्रम में नहीं थे।
गांववालों और आश्रम के लोगों ने तलाश की तो दोनों के शव (हाथ पैर बंधे हुए) गोदाम में पड़े मिले। आश्रम का सामान भी बिखरा हुआ था। मर्सी के जेवरात भी गायब थे। संदेह था कि घटना लूट के बाद की गई है। इस आधार पर पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या, साक्ष्य छुपाने और लूट के आरोप में मुकदमा दर्ज कर लिया।
जांच पड़ताल करने के बाद 14 अक्तूबर 2008 को तीन आरोपियों फ्रांसिस उर्फ जुगल किशोर निवासी श्रद्धापुरी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, अरुण वाल्मीकि निवासी डिडौली जेपीनगर और विपिन पंवार उर्फ बबलू निवासी दक्षिणपुरी सेक्टर 525 नई दिल्ली को गिरफ्तार किया गया। 15 अक्तूबर 2008 को तीनों की निशानदेही पर डिडौली गांव से आश्रम से मर्सी के लूटे हुए जेवरात भी बरामद किए गए। इस मुकदमे में 20 अक्तूबर 2008 को पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।
जया ठाकुर के मुताबिक मुकदमे में अभियोजन की ओर से वादी, विवेचक, पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक, फिंगर प्रिंट्स एक्सपर्ट आदि समेत कुल 12 गवाह पेश किए गए। इसके अलावा कुल 38 अभिलेखीय साक्ष्य अदालत में प्रस्तुत किए गए। इन सभी साक्षी और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने सोमवार को तीनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा का एलान किया। दोषियों को धारा 302 (हत्या) में उम्रकैद व पांच हजार रुपये जुर्माना, धारा 394 (लूट) में पांच वर्ष कारावास व दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।