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नदियों पर अब कायम होगा माफियाराज

Thu, 09 Jan 2014 10:50 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 09 Jan 2014 10:50 PM IST
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river mining in private hand

प्रदेश सरकार ने भले ही लाभ का तर्क देते हुए रिजर्व फारेस्ट की नदियों में खनन का जिम्मा निजी हाथों को सौंपने का आदेश जारी कर दिया हो, लेकिन सचाई यह है कि इससे पूरे राज्य की नदियों में माफियाराज कायम करने का ही रास्ता साफ हुआ है।

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सरकार के इस कदम से प्रदेश को हर साल अरबों के राजस्व की हानि तो होगी ही, वन्यजीवों का वासस्थल प्रभावित होने के साथ उनके शिकार की घटनाएं बढ़ने की भी आशंका है।
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वरिष्ठ नौकरशाह का है दिमाग
सूत्र बताते हैं कि एक वरिष्ठ नौकरशाह पिछले तीन साल से इस निर्णय का ताना-बाना बुन रहा था। भले ही टेंडर और खनन का काम उत्तराखंड वन विकास निगम की देखरेख में कराने का दावा किया जा रहा है, लेकिन जितनी कमाई दिखाई जा रही है, उससे कहीं अधिक नुकसान होना तय है। हरिद्वार और विकासनगर में खराब अनुभव के बावजूद प्रदेश सरकार को कुछ नजर नहीं आ रहा।


ऐसे होगा नुकसान
नदी से खनन का एक वैज्ञानिक तरीका होता है। मानकों के अनुसार किसी भी नदी से एक निश्चित पैमाने तक ही खनन सामग्री की निकासी की जानी चाहिए। लेकिन निजी कंपनियां, ठेकेदार मुनाफे के फेर में क्षमता से कहीं अधिक खनन कर डालते हैं।

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जहां की अनुमति होती है, उसके आसपास भी अवैज्ञानिक खनन कर दिया जाता है। कहीं, कोई चेकिंग न होने से राजस्व के साथ ही पर्यावरण की भी क्षति होती है।

इनका है कहना
रिजर्व फारेस्ट की नदियों में खनन से वन्यजीवों को नुकसान तय है। वन्यजीव नदियों में पानी पीने आते हैं। खनन से उनका वास स्थल भी प्रभावित होगा। इससे शिकार की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।
-एएस नेगी, पूर्व मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक

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