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ऐतिहासिक है ये वटवृक्ष, आज ही के दिन इस पेड़ पर लटका दिए गए थे सैकड़ों क्रांतिकारी

Sun, 10 May 2020 03:51 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रुड़की
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रुड़की Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 10 May 2020 03:51 PM IST
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Revolution of 1857: Many Revolutionary Hanged on  Roorkee This Tree
वटवृक्ष - फोटो : अमर उजाला

उत्तराखंड के रुड़की शहर से कुछ दूरी पर स्थित सुनहरा गांव में मौजूद ऐतिहासिक वट वृक्ष ब्रिटिश हुकूमत के जुल्म का मूक साक्षी बना हुआ है। अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने वाले सौ से अधिक क्रांतिकारियों एवं ग्रामीणों को इस वट वृक्ष पर सरेआम फांसी पर लटका दिया गया था। वट वृक्ष पर पड़े कुंडों के निशान, जिनमें जंजीर बांधी जाती थी, आज भी राष्ट्र के लिए प्राणों को न्योछावर करने वालों के बलिदान की याद दिलाते हैं।

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1857 की क्रांति को भले ही देश की आजादी की पहली क्रांति कहा जाता हो, लेकिन अंग्रेजी गजेटियर के मुताबिक रुड़की में इस क्रांति की ज्वाला इससे काफी पहले भड़क उठी थी। अक्तूबर 1824 को कुंजा ताल्लुक में राजा विजय सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध हुआ। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग शहीद हुए तो कुछ पकड़े गए।
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बताया जाता है कि 1857 की क्रांति का बिगुल बजना शुरू हुआ तो सहारनपुर के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सर राबर्टसन ने रामपुर, कुंजा, मतलबपुर आदि गांव के ग्रामीणों को पकड़कर इस पेड़ पर सरेआम फांसी पर लटका दिया।

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लोगों को भयभीत करने के लिए किया था ऐसा

उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया कि लोग भयभीत हो जाएं और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज न उठा सकें। साथ ही रुड़की व सहारनपुर में मौजूद छावनी से फौज को दूसरी जगह भेजा जा सके।

ऐतिहासिक दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि इस दौरान अंग्रेजों के खौफ से आसपास के लोग गांव छोड़कर चले गए थे। साल 1910 में शहर के लाला ललिता प्रसाद ने इस वट वृक्ष की भूमि को खरीद लिया था। उसके बाद यहां मंत्राचरणपुर गांव बसाया गया, जो बाद में सुनहरा के नाम से जाना गया।

1947 में जब देश आजाद हुआ, तब तक इस पेड़ पर लोहे के कुंडे एवं जंजीरें लटकी हुई थीं, जो कि बाद में लोगों ने धीरे-धीरे उतार लिए। जिसके निशान इस पेड़ की टहनियों पर आज भी मौजूद हैं।

श्रद्धांजलि कार्यक्रम तक सीमित

देश की आजादी के बाद 1957 में पहली बार इस पेड़ के नीचे तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट बीएस जमेल की अध्यक्षता में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित कर शहीदों को याद किया गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.यासीन जब तक जीवित रहे, तब तक शहीद यादगार कमेटी के बैनर तले इस वट वृक्ष पर शहीदों को श्रद्धाजलि देते रहे। 1995 को उनके देहांत के बाद उनके बेटे डॉ.मोहम्मद मतीन इस कमेटी के अध्यक्ष हैं, और वट वृक्ष के नीचे कार्यक्रम आयोजित करते हैं।

सरकार ने की उपेक्षा
ऐतिहासिक वट वृक्ष को शासन-प्रशासन ने पूरी तरह से बिसरा दिया। विधायक निधि से इस वट वृक्ष का सौंदर्यीकरण तो हुआ, पर पहुंच मार्ग बदहाल है। कोई ऐसी पहचान इस पेड़ को नहीं मिल पाई, जिसका यह हकदार है। अब इस पेड़ के नीचे कोई बड़ी सभा आयोजित नहीं की जाती। मात्र कुछ गिने-चुने लोग ही दस मई को यहा शहीदों को नमन करने पहुंचते हैं।

शहीद भी गुमनाम
सुनहरा के वट वृक्ष पर फांसी पर लटकाए गए सौ से अधिक क्रांतिकारी और ग्रामीण गुमनाम हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों में उनके नाम का उल्लेख नहीं है। इतना जरूर लिखा गया है कि ये सभी आसपास के गावों के रहने वाले थे।

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