Uttarakhand: रामपुर तिराहा कांड को तीस साल...आज भी उस रात को याद कर सहम जाते हैं आंदोलनकारी
रामपुर तिराहा कांड में पुलिस फायरिंग से सात आंदोलनकारी शहीद हुए थे। उत्तराखंड राज्य निर्माण की मांग को लेकर दिल्ली में होने वाली रैली के लिए निकले थे।
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आज (दो अक्तूबर) ही के दिन 30 साल पहले यूपी के मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे में निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों के साथ हुई घटना को याद कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह कहना है राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान का।
जुगरान के मुताबिक, राज्य के लोग उस घटना को कभी भुला नहीं सकते। यह घटना लोकतंत्र के इतिहास में काला अध्याय है। जहां रात के घुप अंधेरे में मातृशक्ति का अपमान हुआ और सुबह निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई गईं, जिसमें सात आंदोलनकारी शहीद हुए, जबकि कई को गंभीर चोटें आईं।
जुगरान के मुताबिक, एक अक्तूबर की रात नौ बजे उत्तराखंड राज्य निर्माण की मांग को लेकर दिल्ली में होने वाली रैली के लिए निकले थे। जांच के नाम पर पुलिस ने पहले मोहंड पर रोका। फिर नारसन में रोका गया। सुबह पांच बजे मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर पहुंचे। जहां एक किमी तक बसों और निजी वाहनों की कतारें लगी थी।
बैरिकेडिंग कर आंदोलनकारियों को रोका गया
बिना किसी वजह के पुलिस ने वाहनों में भारी तोड़फोड़ की। पुलिस ने बैरिकेडिंग कर आंदोलनकारियों को आगे जाने से रोक दिया। मौके पर मौजूद तत्कालीन एसपी आरपी सिंह, जिलाधिकारी अनंत कुमार सिंह व डीआईजी बुआ सिंह से अनुरोध किया पर उन्होंने ऊपर से आदेश का हवाला देकर आगे जाने की इजाजत नहीं दी।
हमने सड़क पर बैठकर भजन कीर्तन शुरू किया। थोड़ी देर बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया और गोली चलने की आवाज सुनाई दी। गोलीकांड में सात आंदोलनकारी शहीद हुए और कई घायल हुए। इसके बाद हमें गिरफ्तार कर अस्थायी जेल ले जाया गया। जहां से दोपहर लगभग एक बजे छोड़ा गया।
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इसके बाद वापस देहरादून के लिए रवाना हुए। चिह्नित राज्य आंदोलनकारी समिति के केंद्रीय संरक्षक धीरेंद्र प्रताप बताते हैं कि रैली के लिए दिल्ली के तत्कालीन कमिश्नर से अनुमति ली गई थी। इसके बाद भी आंदोलनकारियों को रामपुर तिराहे से आगे नहीं बढ़ने दिया गया। कहा, घटना के 30 साल बाद भी हमें न्याय नहीं मिला।