रामपुर तिराहा कांड : आंदोलनकारियों पर बरसाई थी गोलियां, महिलाओं से हुआ था दुर्व्यवहार, 26 साल बाद भी इंसाफ की आस अधूरी
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रामपुर तिराहा कांड के आरोपी अफसरों को सजा दिलाने के लिए 26 साल से चल रही कानूनी लड़ाई किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। नौ मुकदमों में से पांच एक-एक करके निपट चुके हैं। एक मुकदमे पर कई साल से कार्रवाई कोर्ट के आदेश पर स्थगित है, जबकि तीन मामले कोर्ट में विचाराधीन है। कोरोना काल के चलते कोर्ट में नए मजिस्ट्रेट की नियुक्ति का नोटिफिकेशन नहीं हो पाया है।
रामपुर तिराहा गोलीकांड@26: अभी तक नहीं भरे उस काल रात के जख्म, अमानवीयता की हद हुई थी पार
एक अक्तूबर 1994 की रात को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर उत्तराखंड से दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को पुलिस ने रोक दिया था। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार किसी भी कीमत पर आंदोलनकारियों को दिल्ली नहीं जाने देना चाहती थी। आंदोलनकारी गुरुकुल नारसन बार्डर पर बनाए गए बैरियर को तोड़कर मुजफ्फरनगर की तरफ बढ़ गए थे। पुलिस ने हाईवे बंद कर बसों को रोक लिया।
आंदोलनकारियों ने बसों से उतरकर पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसी बीच पत्थरबाजी में तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह के घायल होने के बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर करीब ढाई सौ लोगों को हिरासत में ले लिया था। देर रात 42 बसों में आंदोलनकारी फिर आ धमके। हिंसक झड़पों के बीच हुई फायरिंग में उत्तराखंड के सात आंदोलनकारी मारे गए थे, जबकि 17 के करीब घायल हुए थे। इतना ही नहीं महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। इसका आरोप पुलिसकर्मियों पर लगा था।
तब रामपुर तिराहा कांड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बना था। मामला गरमाया तो सीबीआई को पूरे मामले की जांच सौंपी गई। इस मामले में नौ मुकदमे दर्ज किए गए थे। इनमें से अफसरों के खिलाफ दो मुकदमों में यूपी सरकार ने अनुमति देने से मना कर दिया, जबकि इंस्पेक्टर मोती सिंह, उप निरीक्षक दाताराम और उप निरीक्षक राजबीर सिंह की मौत के कारण तीन मुकदमे खुद ही समाप्त हो गए।
सीबीआई बनाम राधा मोहन द्विवेदी पर कई साल से स्टे चल रहा है, जिस कारण उस पर सुनवाई नहीं हो सकी है। फिलहाल सीबीआई बनाम हरमिलाप, सीबीआई बनाम मिश्रा और सीबीआई बनाम ब्रजकिशोर कोर्ट में विचाराधीन है। कोरोना काल के चलते इन मुकदमों पर सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। इस गोलीबारी कांड के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए भाजपा और कांग्रेस हमेशा वादा करती रही हैं, सत्ता के खेल में दोनों दलों की प्राथमिकता बदलती चली गई। 26 साल की लंबी लड़ाई के बाद पीड़ित परिवार आज भी इंसाफ की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
दो अक्तूबर को पुलिस की गोली से शहीद हुए थे कई आंदोलनकारी
एक अक्तूबर 1994 को टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग से बसों से आंदोलनकारी दिल्ली कूच करने के लिए ऋषिकेश में एकत्रित हुए थे। ऋषिकेश से सभी आंदोलनकारी रैली के रूप में बसों से आगे निकले। जैसे ही रुड़की में पहुंचे तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के वाहनों को रुड़की बोट क्लब पर रोक दिया था। यहां से आंदोलनकारी जैसे-जैसे आगे निकले। जब नारसन बार्डर पर पहुंचे वहां मुजफ्फरनगर पुलिस ने आंदोलनकारियों को जिले की सीमा में प्रवेश नहीं करने दिया। रात के नौ से सुबह चार बजे तक पुलिस और प्रदर्शनकारियों में झड़प होती रही। चार बजे तड़के पुलिस की मारपीट में कई महिलाओं को चोट लगी। चार बजे रामपुर तिराहे पर मुजफ्फरनगर पुलिस ने गोली चला दी। इसमें कई प्रदर्शनकारी शहीद हो गए थे। रामपुर तिराहे गोलीकांड को याद कर अब भी मेरी रूह कांप जाती है।
-त्रिवेंद्र सिंह पंवार, आंदोलनकारी
मैं भी 1994 में उत्तराखंड आंदोलन में शामिल हुआ था। उस समय में आंदोलनकारियों में मैं सबसे छोटा आंदोलनकारी था। जो घटना उस रात को हुई, वह दृश्य याद कर दिल आज भी झकझोर उठता है। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर जमकर लाठीचार्ज किया था। हम सब तितर-बितर हो गए थे। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, हो क्या रहा है।
-हेमंत डंग, आंदोलनकारी
आज भी जहन से नहीं निकला मुजफ्फरनगर गोलीकांड
अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच 2 अक्तूबर 1994 को हुआ मुजफ्फरनगर गोलीकांड लोगों के जहन से भुलाए नहीं भूलता। उस गोलीकांड को याद करते ही आज भी राज्य आंदोलनकारी सिहर उठते हैं।
राज्य आंदोलनकारी भगवान सिंह बताते हैं कि किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि पुलिस गोलीबारी कर सकती है। पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोली और लाठी बरसानी शुरू कर दी। नारसन स्थित राजा महेंद्र प्रताप डिग्री कॉलेज के प्रबंध समिति के सचिव नरेश चौधरी ने बताया कि आंदोलनकारियों के साथ टकराव तो नारसन से ही शुरू हो गया था। उनके डिग्री कॉलेज स्थित हॉस्टल में सैकड़ों आंदोलनकारियों को शरण दी गई थी।