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रामपुर तिराहा गोलीकांड@26: अभी तक नहीं भरे उस काल रात के जख्म, अमानवीयता की हद हुई थी पार

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 02 Oct 2020 02:25 AM IST

सार

  • राज्य आंदोलन की आग को और तेज कर गया था यह दमन
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रामपुर तिराहा कांड
रामपुर तिराहा कांड - फोटो : फाइल फोटो

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विस्तार

मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर एक अक्तूबर की रात और दो अक्तूबर की सुबह तक 1994 में राज्य आंदोलनकारियों को मिले जख्म 26 साल बाद भी आज तक नहीं भर पाए हैं। एक अक्तूबर की वह रात दमन, बलप्रयोग और अमानवीयता की हदों को पार करने वाली साबित हुई।
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यह सबकुछ जिस वजह से हुआ परिणाम भी सियासत को ठीक उलटा ही मिला। राज्य आंदोलन की आग तेज हुई और पहाड़ ने मुझे वोट नहीं दिया कहने वाले नेता रातों-रात खलनायक बन गए। 


यह वह दौर था जब उत्तर प्रदेश का यह पहाड़ी हिस्सा मंडल के झंझावत से निकला ही था। कोदा-झंगोरा खाएंगे, अपना उत्तराखंड बनाएंगे के नारे हवा में तैरा करते थे। हर कोई किसी न किसी रूप में राज्य आंदोलन से जुड़ा हुआ था। पहाड़ उस समय दो चीजों के लिए जना जाता था- पनिशमेंट पोस्टिंग या फिर फौज।

राज्य आंदोलन संघर्ष समिति का जन्म हो चुका था और इसी के आह्वान पर दो अक्तूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना तय किया गया था। राज्य आंदोलन के कई नेता पहले ही दिल्ली पहुंच चुके थे। यही आह्वान और आंदोलन की भावना का सबब था कि गढ़वाल और कुमाऊं से बसों में भरकर लोग एक अक्तूबर को दिल्ली के लिए रवाना हुए। 

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और यह तय कर लिया गया था कि आंदोलनकारियों को आगे नहीं जाने देना है। पहले नारसन बार्डर पर नाकाबंदी हुई। यहां पर आंदोलनकारियों के आगे प्रशासन बेबस हो गया। सैकड़ों बसों का काफिला आगे बढ़ा तो राज्य आंदोलनकारियों का सामना रामपुर तिराहे पर पूरी तैयारी के साथ मौजूद पुलिस प्रशासन से हुआ।
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भारी संख्या में जुटे थे लोग

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