यहां सौ साल से होती चली आ रही है रामलीला, इनके कई कलाकर बने चुके हैं बड़े नेता और स्टार
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पंचपुरी में रामलीलाओं का लंबा इतिहास है। रामलीलाओं से पूर्व रामनाटक हुआ करते थे, जिनके कलाकारों का नाम दूर-दूर तक पहुंच गया था।
ब्रिटिश सरकार ने जब रामलीलाएं नहीं होने दी तब पंचपुरी वासियों ने छोटे-छोटे रामनाटक कर भगवान राम को याद किया। बाद में रामलीलाएं शुरु हुई और आज कईं रामलीलाएं सौ वर्षों से अधिक पुरानी हो चुकी हैं।
पंचपुरी की रामलीलाओं से जहां कईं कलाकार निकले हैं, वहीं कईं नेता भी रामलीलाओं की ही देन हैं। सरदार राम रक्खा, आनंद प्रकाश शर्मा, जगदीश चौधरी, राममूर्ति वीर, अशोक त्रिपाठी, अंबरीश कुमार, हरपाल साथी, राम बाबू पचभैया, जयप्रकाश सरायवाले, वासुदेव ठेकेदार, सोमदत्त श्रोत्रिय, रामकुमार अरोड़ा आदि जैसे अनेक नेता रामलीलाओं की देन हैं। पूर्व विधायक राजकुमार शर्मा रामलीला में राम का अभिनय किया करते थे।
रामलीला ने अश्विनी पोखरिया जैसे क्रिकेट कमेंटेटर देश को दिए
हरिद्वार के ज्वालापुर की रामलीला को यह श्रेय प्राप्त है कि पृथ्वी थियेटर के विख्यात कलाकार मास्टर संत सिंह ने यहां आकर कईं दशकों तक रावण, अंगद, दशरथ आदि का अभियन किया।
विख्यात संगीतकार शंकर जय किशन के गीतों में क्लारनेट बजाने वाले मास्टर अमर सिंह इस रामलीला में हर वर्ष अपना हुनर दिखाया करते थे। मास्टर रतन, पंड़ित विष्णु मिश्र, ओम प्रकाश भट्ट, राम प्रताप भक्त, गंगा प्रसाद तबलची जैसे न जाने कितने वादक पंचपुरी के रामलीलाओं से निकाले।
इस रामलीला ने अश्विनी पोखरिया जैसे क्रिकेट कमेंटेटर देश को दिए। पंचपुरी की रामलीलाओं में कृष्ण चंद्र पटुवर, नंद कुमार पोखरिया, शशिकांत, प्यारेलाल भटेजा, सीताराम रामलीला वाले, दुर्गाशंकर भाटी, चंद्रमोहन, नित्यनंद, देवी शरण शर्मा, रमेश खन्ना, सत्य नारायण अल्हड, पवन मौलातिये, नोन जोशी, यशपाल अरोडा, फकीर चंद्र, जयप्रकाश कौशिक आदि के नामों को भला कौन भुला सकता है। यहां की रामलीला सेठ मोहनलाल, बाबू माइदयाल जैसे अनेक महापुरुषों की सदा ऋणि रहेंगी।
कुल मिलाकर 165 वर्षों पुरानी हो चुकी है कनखल की रामलीला
वास्तव में पंचपुरी की रामलीलाएं देहातों से शहरों में आई। कनखल की वरामलीला का मूल ग्राम जगजीतपुर था। यहां यह रामलीला 60 वर्षों तक होती रही। बाद में जगजीतपुर के रामलीला कनखल जा पहुंची।
इस प्रकार कनखल की रामलीला कुल मिलाकर 165 वर्षों पुरानी हो चुकी है। ज्वालापुर रामलीला मैदान की रामलीला 105 वर्ष पुरानी हो गई है। हरिद्वार शहर की रामलीला अभी 80वें वर्ष में पहुंची है।
समीपवर्ती बहादराबाद की रामलीला 110 वर्षों से अधिक पुरानी है। आज के समय में भीमगोडा, मायापुर, कृष्णानगर, रामनगर आदि अनेक स्थानों पर रामलीलाओं का मंचन होता है। पंचपुरी कली रामलीलाएं देखने के लिए एक जमाने में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक जनपदों से दर्शक आया करते थे।
माचिस की डिबिया पर बनाते थे गीतों की धुन
गुरु परसराम चक्रपाणी रामलीलाओं के जाने माने संगीतकार थे। उन्होंने रामलीला के तमाम गीतों की धुनें बनाई। गुरु परसराम ऐसे कलाकार थे, जो माचिस की डिबिया पर तबला बजाते हुए धुन बना देते थे। उन्होंने रामलीला के अधिकांश संवाद भी लिखे हैं। गुरु परसराम के वर्षों पूर्व गुजर जाने के बावजूद उनकी बनाई धुनें आज भी रामलीलाओं की शोभा बनी हुई हैं।
जब घर से ही रावण बनकर निकले कलाकार
बहादराबाद की रामलीला में रावण का अभिनय करने वाले सबल सिंह को रावण की पोशाक घर से ही पहनकर रामलीला के मंच तक पहुंचना बहुत भारी पड़ गया था। बात कई साल पुरानी है। रावण की कमर पर लटकने वाला कमरबंद सड़क को छूता हुआ चल रहा था। मुकुटधारी कलाकार को देखकर गांव के कुत्ते उनके पीछे पड़ गए। घर से मेकअप कर निकलना बहुत भारी पड़ा। बाद में जख्मी हो जाने के कारण उन्हें कईं टीके लगवाने पड़े।