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भाई राजेश सूरी को इंसाफ दिलाने के लिए चार साल से लड़ाई लड़ रही है बहन 

Mon, 13 Aug 2018 02:02 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 13 Aug 2018 02:02 PM IST
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rajesh soori murder sister fight for justice
RTI

भाई राजेश सूरी को इंसाफ दिलाने की लड़ाई लड़ रही बहन रीता सूरी जांचों के जंजाल में फंसकर रह गई हैं। हालात ये हैं कि जो काम पुलिस और जांच एजेंसियों को करने चाहिए थे, अब उन्हें वे खुद आरटीआई को हथियार बनाकर कर रही हैं। रीता सूरी भाई राजेश की मौत के बाद करीब चार साल से एक भी दिन चैन से नहीं बैठी हैं। 

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दरअसल, अधिवक्ता राजेश सूरी प्रदेश में हुए कई बड़े घोटालों के राज जानते थे। उन्होंने कई घोटालों को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं, जिनमें से कई मामलों में जांच के बाद दोषियों को सजा भी हुई। उन्हें काफी पहले से ही अपनी हत्या का डर था। शायद यही कारण था कि उन्होंने अपनी मौत से दो दिन पहले एक वीडियो बनाया था, जिसमें उन्होंने अपनी हत्या की आशंका जताई थी। इस वीडियो में उन्होंने कई बड़े नामों के साथ पुलिस के कुछ अधिकारियों के नाम भी लिए थे। इसके बाद हाईकोर्ट नैनीताल से लौटते वक्त 29 नवंबर 2014 को राजेश की ट्रेन में तबीयत खराब हो गई थी। इसके अगले दिन 30 नवंबर को राजेश सूरी की मौत हो गई थी। पोस्टमार्टम हुआ तो चिकित्सकों ने मौत का कारण हार्ट अटैक बताया और विसरा जांच के लिए भेज दिया था। राजेश की मौत के बाद रीता सूरी ने उन्हें इंसाफ दिलाने की लड़ाई शुरू की। मौत के पांच दिन बाद पांच दिसंबर 2014 को रीता सूरी की शिकायत पर कोतवाली में नामजद मुकदमा दर्ज कराया गया। लगभग नौ महीने बाद 28 अगस्त 2015 को विसरा की रिपोर्ट आई, जिसमें राजेश की मौत जहर के कारण होना बताया गया। रीता बताती हैं कि इस रिपोर्ट के आने के बाद भी पुलिस पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जांच उसी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। 
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इसके बाद उन्होंने तत्कालीन डीजीपी बीएस सिद्धू से शिकायत की तो उन्होंने मुकदमे में एक धारा बढ़ाकर जांच एसआईटी से कराने के आदेश दिए। तत्कालीन एसपी सिटी रहे अजय सिंह की अध्यक्षता में तीन सदस्य एसआईटी ने आठ सितंबर 2015 को जांच शुरू की। रीता सूरी का कहना है इसी बीच 31 अगस्त 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। इसके बाद राज्यपाल ने भी इसके लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया था। बावजूद इसके 26 अक्तूबर 2016 को सीबीआई ने कार्य की अधिकता की बात कहते हुए जांच करने से इंकार कर दिया। उसी दिन मामले की जांच कर रही एसआईटी ने भी नाटकीय ढंग से फाइनल रिपोर्ट लगा दी। हालांकि, रीता सूरी का कहना है कि जब तक राजेश सूरी को इंसाफ नहीं मिल जाता तब तक वे चुप नहीं बैठेंगी।
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आखिर बंद लिफाफे में क्या राज है?
अधिवक्ता राजेश सूरी के बंद लिफाफे को 16 साल बाद भी नहीं खोला गया है। आखिर क्या है इस लिफाफे में जो उन्होंने अपनी मौत से 12 साल पहले ही लिखकर प्रशासन को दे दिया था? इस लिफाफे को न तो मुकदमे की जांच कर रही थाना पुलिस ने खुलवाने की कोशिश की और न ही बाद में एसआईटी ने। ऐसे ही कई सवाल हैं जिन पर से एसआईटी ने 13 महीनों की जांच के बाद भी पर्दा नहीं उठाया था। इन्हीं बातों को लेकर अब रीता सूरी ने एसआईटी जांच पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसी याचिका पर हाईकोर्ट ने फाइनल रिपोर्ट पर दोबारा सुनवाई के आदेश दिए हैं।

दरअसल, राजेश सूरी ने मौत से 12 साल पहले 2002 में जज क्वार्टर घोटाले की जांच के दौरान एडीएम वित्त को एक बंद लिफाफा दिया था। इसके बारे में राजेश ने कहा था कि यदि भविष्य में उनकी मौत होती है तो इस लिफाफे को खोलकर देख लिया जाए। नवंबर 2014 में राजेश की मौत हो गई और पांच दिसंबर को कोतवाली में हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ। बावजूद इसके पुलिस की जांच इस लिफाफे तक नहीं पहुंची। रीता सूरी का कहना है कि इस लिफाफे के बारे में राजेश ने उनसे भी जिक्र किया था। राजेश ने कहा था कि इसमें कई ऐसे लोगों के नाम हैं जो उनकी हत्या करा सकते हैं। राजेश की मौत के लगभग 10 महीने बाद एसआईटी का गठन हुआ। एसआईटी ने 13 महीनों तक जांच करने का दावा किया, मगर इस लिफाफे को खुलवाने की जहमत नहीं उठाई। वर्तमान में भी यह लिफाफा एडीएम वित्त के कार्यालय में ही मौजूद है। ऐसे ही कई सवालों की वजह से एसआईटी की जांच और उसकी फाइनल रिपोर्ट संदेह के घेरे में है। 

ये उठ रहे हैं सवाल 
1-राजेश ने तीन पुलिस अधिकारियों के नाम भी लिए थे। इन्हें विभिन्न न्यायालयों से भी नोटिस मिल चुके हैं। मगर एसआईटी ने 13 महीनों की जांच में इनसे पूछताछ क्यों नहीं की? 
2-राजेश के साथ हमेशा सुरक्षा गार्ड सिपाही हेमंत बिष्ट रहता था। मौत के समय वह राजेश के साथ नहीं था। एसआईटी ने इस गार्ड की भूमिका की जांच  क्यों नहीं की? 
3-नैनीताल में राजेश किस होटल में ठहरे थे, वापस लौटते समय वे ट्रेन के किस बोगी किस बर्थ पर बैठे थे? इन सबके बारे में भी एसआईटी ने जांच नहीं की और फाइनल रिपोर्ट लगा दी। 

4-बिना किसी संदेह के एफएसएल की विसरा रिपोर्ट दोबारा जांच के लिए दिल्ली क्यों भेजी गई? जबकि, दिल्ली से बताया गया कि विसरा और रिपोर्ट में छेड़छाड़ की गई है। यह छेड़छाड़ किसने की इसकी जांच भी क्यों नहीं कराई गई? 
 5-एसआईटी में तीन सदस्य एएसपी अजय सिंह, डीएसपी अरुण पांडेय और इंस्पेक्टर अनिल जोशी थे। जबकि, फाइनल रिपोर्ट पर अकेले एएसपी के हस्ताक्षर क्यों थे? 
 6-एसआईटी ने एफआर लगाई लेकिन उसकी जानकारी वादी रीता सूरी को नहीं मिली। साथ ही एफआर को लेकर कोर्ट से मिले नोटिस भी रीता सूरी को तामिल नहीं कराए गए।

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