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Dehradun News: 150 साल पुरानी सामुदायिक पुलिस को नया रूप देने की तैयारी
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I सात और आठ अक्तूबर को होने वाली पुलिस साइंस कांग्रेस में रहेगा अहम मुद्दा
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I संयुक्त प्रदेश के इसी हिस्से में 1870 में शुरू हुई थी सामुदायिक पुलिसिंगI
प्रदेश में करीब डेढ़ सदी से चली आ रही सामुदायिक पुलिसिंग (कम्यूनिटी पुलिसिंग) को नया रूप देने की तैयारी हो रही है। पुलिसिंग इन अमृतकाल थीम पर आयोजित होने जा रही ऑल इंडिया पुलिस साइंस कांग्रेस में सामुदायिक पुलिसिंग ही केंद्र बिंदु होगा। इसके तहत कई प्रस्तावाें को गृहमंत्री अमित शाह के सामने रखा जाएगा। ताकि, तकनीक के युग में पीछे छूट रही सामुदायिक पुलिस को फिर से जीवित कर सुदृढ़ बनाया जा सके।
डीजीपी अशोक कुमार ने बताया कि आधुनिक युग में अपराध की चुनौतियों से निपटने के लिए पुलिस को अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया जाता है, लेकिन समाज के बीच में रहकर ही पुलिस बेहतर काम कर सकती है। इसके लिए सामुदायिक पुलिसिंग बेहद जरूरी है। अब इसे और अधिक सुदृढ़ बनाया जा रहा है। पुलिस की ओर से कुछ प्रस्ताव आगामी सात और आठ अक्तूबर को आयोजित होने वाली ऑल इंडिया पुलिस साइंस कांग्रेस में रखे जाएंगे।
इसके तहत ग्राम चौकीदारों को और अधिक सजग व जिम्मेदार बनाया जाएगा। आधुनिक टूल को सामुदायिक पुलिसिंग में शामिल किया जाएगा। इंटरनेट व सोशल मीडिया को प्रमुख हथियार बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि देशभर के पुलिस अधिकारी इसी विषय पर चर्चा करेंगे।
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I1870 में हुई थी सामुदायिक पुलिस की शुरुआतI
अंग्रेजी शासन काल में उत्तराखंड का यह हिस्सा नार्थ वेस्ट प्रोविंस के अंतर्गत आता था। उस वक्त यहां अधिकतर आबादी पहाड़ों के गांवों में निवास करती थी। ऐसे में यहां रेगुलर पुलिस इतनी कारगर नहीं थी। लिहाजा, 1866 में तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल ने यहां पर सामुदायिक पुलिसिंग का गठन करने पर जोर दिया। करीब चार सालों तक उनके इस प्रस्ताव पर लंदन में मंथन किया गया। इसके बाद 1870 में नार्थ वेस्ट प्रोविंस के इस हिस्से में सामुदायिक पुलिसिंग की शुरुआत हुई। इसके तहत छोटे-छोटे गांवों को ग्राम चौकीदारों के हवाले किया गया। उन्हें वर्दी, भत्ते आदि की व्यवस्था की गई। इन्हीं की इंटेलीजेंस पर रेगुलर पुलिस काम करती थी।
Iवर्तमान में प्रदेश में सामुदायिक पुलिसिंग की स्थितिI
वर्तमान में उत्तराखंड पुलिस अपनी विभिन्न एप और सुविधाओं के माध्यम से सामुदायिक पुलिसिंग की दिशा में काम कर रही है। इसमें गौरा शक्ति एप के माध्यम से 122961 महिलाओं को पुलिस के साथ सीधे तौर पर जोड़ा गया है। ट्रैफिक आई एप के माध्यम से लोग खुद बखुद यातायात नियमों के उल्लंघन पर चालान आदि कटवा सकते हैं। अब तक 81091 चालान काटे जा चुके हैं। इसके अलावा उत्तराखंड पुलिस एप के माध्यम से तमाम सुविधाएं ले सकते हैं। इस एप से अब तक 270265 लोगों को जोड़ा जा चुका है।
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I संयुक्त प्रदेश के इसी हिस्से में 1870 में शुरू हुई थी सामुदायिक पुलिसिंगI
प्रदेश में करीब डेढ़ सदी से चली आ रही सामुदायिक पुलिसिंग (कम्यूनिटी पुलिसिंग) को नया रूप देने की तैयारी हो रही है। पुलिसिंग इन अमृतकाल थीम पर आयोजित होने जा रही ऑल इंडिया पुलिस साइंस कांग्रेस में सामुदायिक पुलिसिंग ही केंद्र बिंदु होगा। इसके तहत कई प्रस्तावाें को गृहमंत्री अमित शाह के सामने रखा जाएगा। ताकि, तकनीक के युग में पीछे छूट रही सामुदायिक पुलिस को फिर से जीवित कर सुदृढ़ बनाया जा सके।
डीजीपी अशोक कुमार ने बताया कि आधुनिक युग में अपराध की चुनौतियों से निपटने के लिए पुलिस को अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया जाता है, लेकिन समाज के बीच में रहकर ही पुलिस बेहतर काम कर सकती है। इसके लिए सामुदायिक पुलिसिंग बेहद जरूरी है। अब इसे और अधिक सुदृढ़ बनाया जा रहा है। पुलिस की ओर से कुछ प्रस्ताव आगामी सात और आठ अक्तूबर को आयोजित होने वाली ऑल इंडिया पुलिस साइंस कांग्रेस में रखे जाएंगे।
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इसके तहत ग्राम चौकीदारों को और अधिक सजग व जिम्मेदार बनाया जाएगा। आधुनिक टूल को सामुदायिक पुलिसिंग में शामिल किया जाएगा। इंटरनेट व सोशल मीडिया को प्रमुख हथियार बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि देशभर के पुलिस अधिकारी इसी विषय पर चर्चा करेंगे।
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I1870 में हुई थी सामुदायिक पुलिस की शुरुआतI
अंग्रेजी शासन काल में उत्तराखंड का यह हिस्सा नार्थ वेस्ट प्रोविंस के अंतर्गत आता था। उस वक्त यहां अधिकतर आबादी पहाड़ों के गांवों में निवास करती थी। ऐसे में यहां रेगुलर पुलिस इतनी कारगर नहीं थी। लिहाजा, 1866 में तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल ने यहां पर सामुदायिक पुलिसिंग का गठन करने पर जोर दिया। करीब चार सालों तक उनके इस प्रस्ताव पर लंदन में मंथन किया गया। इसके बाद 1870 में नार्थ वेस्ट प्रोविंस के इस हिस्से में सामुदायिक पुलिसिंग की शुरुआत हुई। इसके तहत छोटे-छोटे गांवों को ग्राम चौकीदारों के हवाले किया गया। उन्हें वर्दी, भत्ते आदि की व्यवस्था की गई। इन्हीं की इंटेलीजेंस पर रेगुलर पुलिस काम करती थी।
Iवर्तमान में प्रदेश में सामुदायिक पुलिसिंग की स्थितिI
वर्तमान में उत्तराखंड पुलिस अपनी विभिन्न एप और सुविधाओं के माध्यम से सामुदायिक पुलिसिंग की दिशा में काम कर रही है। इसमें गौरा शक्ति एप के माध्यम से 122961 महिलाओं को पुलिस के साथ सीधे तौर पर जोड़ा गया है। ट्रैफिक आई एप के माध्यम से लोग खुद बखुद यातायात नियमों के उल्लंघन पर चालान आदि कटवा सकते हैं। अब तक 81091 चालान काटे जा चुके हैं। इसके अलावा उत्तराखंड पुलिस एप के माध्यम से तमाम सुविधाएं ले सकते हैं। इस एप से अब तक 270265 लोगों को जोड़ा जा चुका है।