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नशे के सौदागरों के ‘कोड’ को तोड़ने में नाकाम रहा है पुलिस प्रशासन
Thu, 08 Aug 2019 03:01 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Thu, 08 Aug 2019 03:01 PM IST
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प्रतीकात्मक
- फोटो : सोशल मीडिया
‘मौसी की छत पर कबूतर’, ‘खंडहर पर तिरंगा’, ‘नदी में आज आएगा पानी’... ये किसी उपन्यास या कहानी के शीर्षक नहीं बल्कि नशे के सौदागरों के कोड वर्ड हैं। इन्हीं कोड वर्ड के सहारे ये दून के युवाओं के खून में जहर घोलने में लगे हैं। कोई नशे की खेप मंगाने के लिए इनका इस्तेमाल करता है तो कोई अपने अड्डे का पत्ता बताने के लिए। ‘पानी की बोतल’, ‘अशरफी’, ‘चावल’ ये भी कोड हैं, जिनका इस्तेमाल माल की कीमत के लिए किया जाता है।
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नशे की अंधी गलियों में छह साल तक फंसकर बाहर निकले एक युवा ने इन सबके बारे में बताया। उसके अनुसार ऐसा नहीं कि हर जगह या हर समय ये कोड चलते हैं। समय समय और अलग अलग जगह ये बदलते भी रहते हैं। कोड का ये तिलिस्म ऐसा है कि जिसे पुलिस प्रशासन वर्षों से तोड़ने की जद्दोजहद कर रहा है, लेकिन केवल छोटे पैडलरों तक पहुंचने के बाद उसके भी हौसले पस्त हो जाते हैं। शहर में शिक्षण संस्थानों के आसपास खुफिया तंत्र भी सक्रिय रहता है। बावजूद इसके अब तक इनका तोड़ नहीं खोजा जा सका। यदि थाना क्षेत्रों के आधार पर बात करें तो हर क्षेत्र में ऐसे अड्डे बन चुके हैं जहां जहर के सौदागर मौत का धंधा करते हैं।
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क्षेत्र और संवेदनशील इलाके
क्लेमेंटटाउन- कैंट क्षेत्र से सटे कुछ पुराने खंडहर और बाग।
प्रेमनगर व सेलाकुई- नदियों के दूर दराज के इलाके व आम और लीची के बाग।
कैंट- टौंस नदी का ऊपरी हिस्सा और कैंट क्षेत्र के खंडहर।
वसंत विहार- खाले के पास बस्तियों से अक्सर पैडलर पकड़े जाते हैं।
राजपुर- पुराने मसूरी मार्ग के आसपास पुराने खंडहर और जंगल के क्षेत्र।
पटेलनगर - हरिद्वार बाईपास के पास बस्ती। यहां से अक्सर पैडलर दबोचे जाते हैं।