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Dehradun News: श्राप से मुक्ति के लिए आपस में लड़े उदपाल्टा-कुरौली के ग्रामीण
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Iग्रामीणों ने रानी और मुन्नी की प्रतिमाओं का कुएं में किया विसर्जनI
जौनसार बावर क्षेत्र के उदपाल्टा गांव में पांईता पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया। ग्रामीणों ने रानी मुन्नी नामक दो सगी बहनों की प्रतीकात्मक घास, दूब और फूलों से सजी प्रतिमाओं को एक कुएं में विसर्जित किया। श्राप मुक्ति के लिए ग्रामीणों ने आपस में गागली युद्ध भी खेला। युद्ध को देखने के लिए आसपास के गांवों से हजारों की संख्या में लोग पहुंचे।
दशहरा पर्व पर उदपाल्टा और कुरौली गांव में वर्षों से गागली युद्ध की परंपरा निभाई जा रही है। मंगलवार सुबह दोनों गांवों के प्रत्येक परिवार ने रानी और मुन्नी की प्रतीकात्मक प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना की। उसके बाद गाजे बाजे के साथ दोनों ही गांवों के लोग पंचायत आंगन में एकत्र हुए।
ग्रामीण लोक नृत्य और गीत गाते हुए क्यांणी नामक जंगल के पास बने कुएं तक पंहुचे। यहां ग्रामीणों ने दोनों बहनों की प्रतिमाओं को कुएं में विसर्जित किया। उसके बाद उदपाल्टा और कुरौली गांव में निवास करने वाले वैष्णव और पतणों के बीच श्राप मुक्ति के लिए चलने वाले गागली युद्ध की रस्म निभाई गई। ग्रामीणों ने एक-दूसरे के साथ अरबी के डंठलों से युद्ध किया।
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गागली युद्ध को देखने के लिए आस-पास के गांवों से हजारों की संख्या में ग्रामीण पहुंचे। युद्ध के बाद दोनों गांवों के लोग एक दूसरे के गले मिले। पंचायत आंगन में महिलाओं और पुरुषों ने जैंता, रासो व हारूल गीत गाए। इस दौरान खत स्याणा राजेंद्र सिंह राय, गजेंद्र सिंह राय, जालम सिंह राय, पूरण सिंह राय, रणवीर सिंह राय, अनील राय , सतपाल राय आदि उपस्थित रहे।
Iएक दिन और समय पर कन्याओं के जन्म तक निभाई जाएगी परंपराI
Iबहनों के श्राप से मुक्ति के लिए होता है गागली युद्धI
उदपाल्टा गांव में दशहरा को पांईता पर्व के रूप में मनाते हैं। यहां रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों की जगह रानी मुन्नी नाम की दो सगी बहनों की दूब (घास) की प्रतिमाओं को कुएं में विसर्जित करने की परंपरा है। यह परंपरा तब तक निभाई जाएगी जब तक दोनों गांवों में एक ही दिन और एक ही समय पर दो कन्याओं का जन्म नहीं होगा।
बताया जाता है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। गांव के बुजुर्ग बताते है कि मान्यता के अनुसार एक ही परिवार में दो भाई थे। जिनकी दो कन्याएं रानी और मुन्नी थी। बताया कि दोनों कन्याएं क्यांणी नाम के जंगल में कुएं पर पानी भरने गई। इस दौरान रानी पैर फिसलने से कुएं में गिर गई। उसके बाद मुन्नी घर आकर परिवार को रानी के कुएं में गिरने की घटना बताई।
परिवार और ग्रामीणों ने रानी की मौत के लिए मुन्नी को ही जिम्मेदार बताया। परिवार और ग्रामीणों के आरोपों से आहत होकर मुन्नी ने भी कुएं में कूद कर अपनी जान दे दी। खत स्याणा राजेंद्र सिंह राय ने बताया कि मान्यता है कि दोनों गांवों मेंं एक ही दिन और एक ही समय पर दो कन्याओं के जन्म होने तक यह परंपरा निभाई जाएगी।
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जौनसार बावर क्षेत्र के उदपाल्टा गांव में पांईता पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया। ग्रामीणों ने रानी मुन्नी नामक दो सगी बहनों की प्रतीकात्मक घास, दूब और फूलों से सजी प्रतिमाओं को एक कुएं में विसर्जित किया। श्राप मुक्ति के लिए ग्रामीणों ने आपस में गागली युद्ध भी खेला। युद्ध को देखने के लिए आसपास के गांवों से हजारों की संख्या में लोग पहुंचे।
दशहरा पर्व पर उदपाल्टा और कुरौली गांव में वर्षों से गागली युद्ध की परंपरा निभाई जा रही है। मंगलवार सुबह दोनों गांवों के प्रत्येक परिवार ने रानी और मुन्नी की प्रतीकात्मक प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना की। उसके बाद गाजे बाजे के साथ दोनों ही गांवों के लोग पंचायत आंगन में एकत्र हुए।
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ग्रामीण लोक नृत्य और गीत गाते हुए क्यांणी नामक जंगल के पास बने कुएं तक पंहुचे। यहां ग्रामीणों ने दोनों बहनों की प्रतिमाओं को कुएं में विसर्जित किया। उसके बाद उदपाल्टा और कुरौली गांव में निवास करने वाले वैष्णव और पतणों के बीच श्राप मुक्ति के लिए चलने वाले गागली युद्ध की रस्म निभाई गई। ग्रामीणों ने एक-दूसरे के साथ अरबी के डंठलों से युद्ध किया।
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गागली युद्ध को देखने के लिए आस-पास के गांवों से हजारों की संख्या में ग्रामीण पहुंचे। युद्ध के बाद दोनों गांवों के लोग एक दूसरे के गले मिले। पंचायत आंगन में महिलाओं और पुरुषों ने जैंता, रासो व हारूल गीत गाए। इस दौरान खत स्याणा राजेंद्र सिंह राय, गजेंद्र सिंह राय, जालम सिंह राय, पूरण सिंह राय, रणवीर सिंह राय, अनील राय , सतपाल राय आदि उपस्थित रहे।
Iएक दिन और समय पर कन्याओं के जन्म तक निभाई जाएगी परंपराI
Iबहनों के श्राप से मुक्ति के लिए होता है गागली युद्धI
उदपाल्टा गांव में दशहरा को पांईता पर्व के रूप में मनाते हैं। यहां रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों की जगह रानी मुन्नी नाम की दो सगी बहनों की दूब (घास) की प्रतिमाओं को कुएं में विसर्जित करने की परंपरा है। यह परंपरा तब तक निभाई जाएगी जब तक दोनों गांवों में एक ही दिन और एक ही समय पर दो कन्याओं का जन्म नहीं होगा।
बताया जाता है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। गांव के बुजुर्ग बताते है कि मान्यता के अनुसार एक ही परिवार में दो भाई थे। जिनकी दो कन्याएं रानी और मुन्नी थी। बताया कि दोनों कन्याएं क्यांणी नाम के जंगल में कुएं पर पानी भरने गई। इस दौरान रानी पैर फिसलने से कुएं में गिर गई। उसके बाद मुन्नी घर आकर परिवार को रानी के कुएं में गिरने की घटना बताई।
परिवार और ग्रामीणों ने रानी की मौत के लिए मुन्नी को ही जिम्मेदार बताया। परिवार और ग्रामीणों के आरोपों से आहत होकर मुन्नी ने भी कुएं में कूद कर अपनी जान दे दी। खत स्याणा राजेंद्र सिंह राय ने बताया कि मान्यता है कि दोनों गांवों मेंं एक ही दिन और एक ही समय पर दो कन्याओं के जन्म होने तक यह परंपरा निभाई जाएगी।