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Dehradun News: एक ही मामले में दो कानूनी उपाय का अधिकार नहीं

Sun, 30 Aug 2026 02:38 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sun, 30 Aug 2026 02:38 AM IST
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No right to two legal remedies for the same matter
एक ही विवाद में पहले रेरा और बाद में उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाने वाले परिवार को राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग से राहत नहीं मिली।
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आयोग ने कहा कि जब शिकायतकर्ताओं ने पहले ही उत्तराखंड रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) में इसी मामले को लेकर कानूनी उपाय चुन लिया था, तो उसी विवाद के लिए बाद में दूसरे मंच पर शिकायत नहीं की जा सकती।आयोग ने अनीता ममगाईं और प्रांजल ममगाईं की ओर से दायर उपभोक्ता शिकायत को खारिज कर दिया। राज्य आयोग की अध्यक्ष कुमकुम रानी और सदस्य बीएस मनराल की पीठ ने यह आदेश सुनाया।
मामला सहस्रधारा रोड स्थित सिक्का कमाया ग्रीन्स में फ्लैट से जुड़ा था। शिकायतकर्ताओं ने बिल्डर से फ्लैट नंबर 702 का कब्जा दिलाने के साथ 10 लाख रुपये मानसिक पीड़ा और वित्तीय नुकसान के मुआवजे की मांग की थी। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी पक्ष के सामने एक ही विवाद के लिए दो समानांतर कानूनी उपाय उपलब्ध हों और वह उनमें से एक को चुन ले, तो उसी कारण के लिए दूसरे उपाय का एक साथ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
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आयोग ने इसे एस्टॉपेल बाय इलेक्शन के सिद्धांत से जोड़ा। चूंकि शिकायतकर्ताओं ने पहले रेरा में शिकायत की थी और उसी मामले की निष्पादन कार्यवाही लंबित थी, इसलिए उपभोक्ता आयोग में दाखिल शिकायत सुनवाई योग्य नहीं मानी गई।
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आयोग के आदेश के अनुसार, परिवार ने वर्ष 2015 में परियोजना में 1535 वर्गफुट का फ्लैट नंबर 403 बुक कराया था। इसके लिए करीब 48.23 लाख रुपये का भुगतान किया गया। समझौते के तहत फरवरी 2019 तक कब्जा दिया जाना था, लेकिन कब्जा नहीं मिला। इसके बाद परिवार ने वर्ष 2019 में रेरा में शिकायत दाखिल की। रेरा ने 18 दिसंबर 2019 को बिल्डर को फ्लैट का कब्जा देने और देरी की अवधि का ब्याज देने का आदेश दिया।
इसके बाद 20 जनवरी 2022 को 78.19 लाख रुपये की वसूली का प्रमाणपत्र जारी किया गया। इसके बाद 25 सितंबर 2022 को दोनों पक्षों के बीच पूर्ण एवं अंतिम समझौता हुआ। इसमें पुराने फ्लैट के स्थान पर 2275 वर्गफुट का फ्लैट नंबर 702 देने पर सहमति बनी। वसूली प्रमाणपत्र में दर्शाई गई 78.19 लाख रुपये की राशि को समायोजित किया जाना था और परिवार को 15 लाख रुपये अतिरिक्त तीन किस्तों में देने थे।

बिल्डर का पक्ष था कि परिवार ने 15 लाख रुपये की तय राशि जमा नहीं की। आयोग ने भी रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि शिकायतकर्ताओं के पास यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज नहीं था कि उन्होंने यह रकम बिल्डर को देने की पेशकश की थी। दूसरी ओर, रेरा में पहले से शुरू की गई निष्पादन कार्यवाही भी लंबित थी। इसलिए आयोग ने याचिका खारिज कर दी।
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