मौत के सामान से भरे पड़े हैं देहरादून के मॉल
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देहरादून के क्रॉस रोड मॉल में लगी आग ने भले ही लोगों को चौंकने पर मजबूर किया हो, मगर शहर दूसरे मॉल की सुरक्षा इससे साफ बेपरवाह दिखती है।
बुधवार को अमर उजाला टीम ने शहर के विभिन्न मॉल और मल्टीप्लेक्स में जाकर सुरक्षा का जायजा लिया तो तकरीबन हर जगह गंभीर खामियां नजर आईं।
सिटी जंक्शन मॉल
यहां मल्टीप्लेक्स, रेस्टोरेंट, कपड़ों के शोरूम के अलावा क्रॉकरी स्टोर भी हैं। आमतौर पर मॉल में एक ही एक्जिट गेट ओपन रहता है।
मॉल के पिछले हिस्से में गैस बैंक नाम से तार का घेरा लगाकर चेंबर बने हैं। इनमें भट्टी जलाने वाले कोयले के साथ रखे एलपीजी सिलेंडर और लीकेज से कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
हालांकि मल्टीप्लेक्स मैनेजर (प्रशासन) संजय राणा ने बताया कि मल्टीप्लेक्स के दायरे में आग से बचाव के सभी बंदोबस्त हैं।
2012 से चेक नहीं हुआ आग बुझाने वाला यंत्र
पैसेफिक मॉल की पार्किंग में लगा आग बुझाने वाला यंत्र 29 अप्रैल 2012 से चेक नहीं हुआ है। मॉल में ग्राउंड फ्लोर और फर्स्ट फ्लोर पर दो ही एक्जिट गेट खुले मिले।
मॉल में काफी भीड़भाड़ रही। ऐसे में किसी अप्रिय घटना के वक्त बाहर निकलने में लोगों को दिक्कत आनी तय है।
पार्श्वनाथ मॉल
पार्श्वनाथ मॉल में सिल्वर सिटी सिनेमा, रेस्टोरेंट और शोरूम भी हैं। पार्किंग में कई वाहन खड़े हैं।
पार्किंग में आग बुझाने वाले यंत्र अंधेरे में टंगे हैं। आग लगने की स्थिति में उन्हें ढूंढना ही मुश्किल होगा। आग बुझाने वाले पानी का पाइप भी टूटा पड़ा है।
80 फीसदी अपार्टमेंट अवैध
देहरादून शहर के 80 फीसदी अपार्टमेंट अवैध हैं। इनका इस्तेमाल एमडीडीए से कम्प्लीशन सर्टिफिकेट लिए बिना ही जारी है। प्राधिकरण की नियमावली के मुताबिक कम्प्लीशन सर्टिफिकेट बिना अपार्टमेंट इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
मानकों का उल्लंघन पकड़ में न आए, इसलिए ज्यादातर बिल्डरों ने यह सर्टिफिकेट नहीं लिया। रिश्वत के चक्कर में प्राधिकरण अधिकारी कायदे दरकिनार कर देते हैं।
मॉल में होना चाहिए यह
एमडीडीए से नक्शा पास कराने के पहले फायर, जलसंस्थान, बिजली और पीडब्लूडी से अनापत्ति प्रमाण पत्र जरूरी है।
इसके बाद प्राधिकरण नक्शे के अनुसार निर्माण की इजाजत देता है। प्राधिकरण की नियमावली के मुताबिक जब भवन तैयार हो जाए तो सभी मानकों की जांच होनी चाहिए।
मानक पूरे होने पर ही कम्प्लीशन सर्टिफिकेट दिया जाए। तब ही भवन इस्तेमाल किया जा सकता है।
आधे-अधूरे मानकों की जांच नहीं
प्राधिकरण सिर्फ नक्शा पास होने तक ही दिलचस्पी दिखाता है। भवन बनने के बाद बिल्डर इसे बेच लेते हैं, लेकिन कोई कम्प्लीशन सर्टिफिकेट नहीं ले रहा।
इससे अपार्टमेंट में आधे-अधूरे मानकों की जांच नहीं हो पाती है। इसमें सबसे अहम मानक फायर विभाग के हैं। निर्माण में गड़बड़ी की शिकायत आती है तो प्राधिकरण अफसर शमन शुल्क लेकर सब कुछ जायज करार दे देते हैं।
एमडीडीए कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जारी करता है। लेकिन कोई लेने ही नहीं आता है।
- बंशीधर तिवारी, सेक्रेटरी एमडीडीए
एमडीडीए के एक्ट में है कि भवन निर्माण के बाद कम्प्लीशन सर्टिफिकेट लिया जाए। बिना इसके भवन इस्तेमाल नहीं हो सकता।
- डीएस राणा, सीनियर आर्किटेक्ट