गंगा किनारे मनमाने ढंग से नहीं बन पाएंगे मठ-आश्रम, ये होंगी रेग्युलेटरी जोन की शर्तें
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गंगा तट पर अब मनमाने ढंग से मठ और आश्रमों का निर्माण नहीं किया जा सकेगा। इसके साथ ही अन्य आयोजनों पर भी रोक रहेगी। गंगा तट पर निर्धारित सीमा के भीतर कैंपिंग भी नहीं हो पाएगी।
धार्मिक मेलों के आयोजन और अन्य निर्माण के लिए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के आदेश का पालन करना पड़ेगा। एनजीटी के आदेश के अनुपालन पर कैबिनेट की मोहर लगने के बाद शासन इसे लागू कराने की तैयारी में जुट गया है।
एनजीटी के आदेश के अनुपालन में शासन के प्रस्ताव में गंगा की मुख्य धारा से 100 मीटर तक के क्षेत्र को प्रतिबंधित घोषित किया गया है। इस दायरे में किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक है।
प्रतिबंधित क्षेत्र के आगे दो सौ मीटर तक के पर्वतीय क्षेत्र को रेग्युलेटरी जोन घोषित कर दिया गया है। पर्वतीय क्षेत्र में जहां दोनों तरफ पहाड़ हैं, वहां प्रतिबंधित और रेग्युलेटरी जोन को निर्धारित किया जाना है।
यह तय कर दिया गया है कि प्रतिबंधित क्षेत्र में नव निर्माण की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसमें सिर्फ पौधारोपण, तटबंध, तटीय विकास, स्नान घाट निर्माण, बाढ़ प्रबंधन और पुल निर्माण कार्य की अनुमति मिल सकेगी।
रेग्युलेटरी जोन की यह हैं शर्तें
रेग्युलेटरी जोन में समय-समय पर आयोजित होने धार्मिक मेलों और अस्थायी निर्माण के लिए शर्तों का अनुपालन करना आवश्यक होगा। जहां स्थल की ढाल 30 डिग्री से अधिक है, वहां भू वैज्ञानिक की रिपोर्ट के आधार पर निर्माण और पुनर्निर्माण निर्धारित प्रतिबंधों की सीमा तक ही अनुमन्य होंगे।
अप्रतिबंधित क्षेत्र के संबंध में कहा गया है कि 25 सालों की बाढ़ की रिपोर्ट के आधार इसका दायरा 100 मीटर से अधिक भी किया जा सकता है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में डंपिंग ग्राउंड और फिलिंग साइट बनाना निषिद्ध कर दिया गया है।
कैबिनेट में यह प्रस्ताव पास हो गया है। इस पर मंत्रियों के सुझाव के लिए शासन ने प्रति भेज दी है। इसके साथ ही लागू करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। सचिव अमित सिंह नेगी का कहना है कि एनजीटी के आदेश का अनुपालन कराया जाएगा।
रेग्युलेटरी जोन की यह हैं शर्तें
-मठ, आश्रम, मंदिर बनाने के लिए भू आच्छादन 35 प्रतिशत हो
-तल क्षेत्र अनुपात (एफएआर) 0.70
-भवन की अधिकतम ऊंचाई 6.5 मीटर अथवा दो मंजिल से अधिक न हो
-सीवेज निस्तारण की व्यवस्था हो और इसे गंगा की धाराओं में न छोड़ा जाए