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नैनीताल : चेचक खत्म कर बचाई करोड़ों जान, खुद हो गया बेजान,18 वर्षों से बंद स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट का भवन

Sat, 12 Jun 2021 03:27 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal गिरीश रंजन तिवारी, अमर उजाला, नैनीताल
गिरीश रंजन तिवारी, अमर उजाला, नैनीताल Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 12 Jun 2021 03:27 PM IST
सार

नैनीताल से लगभग 12 किमी दूर हल्द्वानी मुख्य मार्ग से लगे हुए 103 एकड़ के विशाल और लगभग चार अरब रुपये कीमत के बेशकीमती परिसर को 18 वर्षों से किसी रूप में उपयोग में नहीं लाया जा रहा है।

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nainital news : State Vaccine Institute building closed from 18 years
स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट पटवाडांगर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महामारी फैलाने वाले वायरस से भी घातक हो सकती है किसी बेहद उपयोगी संस्थान की उपेक्षा, अनदेखी और लापरवाही। खासकर जब वह संस्थान बड़ी से बड़ी महामारी का उन्मूलन करने की क्षमता रखता हो और इसे प्रमाणित भी कर चुका हो। इसका जीता जागता उदाहरण है नैनीताल के पास स्थित स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट पटवाडांगर।

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नैनीताल से लगभग 12 किमी दूर हल्द्वानी मुख्य मार्ग से लगे हुए 103 एकड़ के विशाल और लगभग चार अरब रुपये कीमत के बेशकीमती परिसर को 18 वर्षों से किसी रूप में उपयोग में नहीं लाया जा रहा है।
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इसी संस्थान के नाम, 50 करोड़ लोगों की जान ले चुकी चेचक जैसी घातक वैश्विक महामारी की वैक्सीन तैयार कर इसके उन्मूलन में योगदान देने सहित तमाम घातक रोगों के वैक्सीन उत्पादित करने का रिकॉर्ड दर्ज है। कोरोना महामारी के गंभीर हालात और वैक्सीन के महत्व को देखते हुए इस संस्थान का उपयोग पूर्व की भांति वैक्सीन उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
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वर्ष 1903 में हुई थी स्थापना 
विभिन्न महामारियों जनित व अन्य घातक रोगों से मुकाबला करने के लिए ही वर्ष 1903 में स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई थी और यह अपने उद्देश्य में बेहद सफल भी रहा। यह संस्थान पूर्व में राज्य रक्षालस संस्थान (स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट) के नाम से प्रसिद्ध था लेकिन राजनीतिक उदासीनता और नौकरशाही की विचित्र भूलभुलैया में उलझ कर यह संस्थान फाइलों में ही दम तोड़ रहा है।

उपेक्षा और काहिली का इससे बड़ा उदाहरण यह है कि कभी भव्य रहे इसके शानदार भवन, लैब, अस्पताल और गेस्ट हाउस आदि रखरखाव के अभाव में बुरी तरह जीर्ण शीर्ण पड़े हैं। इनमें सुरक्षा गार्ड, माली आदि को छोड़ अन्य कोई कर्मचारी कार्यरत नहीं हैं। इसके अस्पताल में क्षेत्रीय ग्रामीणों को बेहतरीन चिकित्सा सुविधा सहित परिसर में रोजगार भी मिलता था। यह सब वर्षों से ठप है।

वर्ष 1957 में शुरू हुआ था यहां एंटी रैबीज वैक्सीन का उत्पादन

चेचक को खत्म करने के उद्देश्य से वैक्सीन का निर्माण भी भारत में पटवाडांगर के इस संस्थान से ही हुआ था। वर्ष 1957 में इस संस्थान में एंटी रैबीज वैक्सीन और बाद में टिटनस के वैक्सीन का उत्पादन भी शुरू किया गया। वर्ष 1980 में विश्व से चेचक का उन्मूलन होने के बाद वर्ष 2003 तक अन्य वैक्सीन यहां उत्पादित होते रहे। तत्कालीन तकनीक एवं डब्ल्यूएचओ निर्धारित मानकों के अनुरूप अपेक्षित सुधार और बदलाव करने के बजाय यहां सभी तरह की वैक्सीन का उत्पादन ही बंद कर दिया गया। 

2005 में जीबी पंत कृषि विवि को हुआ था हस्तांतरित
वर्ष 2005 में उत्तराखंड सरकार ने इस संस्थान को जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर को हस्तांतरित कर दिया। 15 साल तक यह संस्थान पंतनगर विवि के पास रहा लेकिन कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल न हो सकी। 2019 में  कुमाऊं विवि के तत्कालीन कुलपति प्रो. केएस राणा ने इस जगह को विवि को दिए जाने की मांग जोर शोर से उठाई लेकिन 2020 में  उत्तराखंड शासन ने इसे उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद हल्दी को सौंप दिया। 

स्टेट वैक्सीन इंस्टिट्यूट पटवाडांगर 2003 में जब से बंद हुआ तब से आज तक किसी ने इसकी सुध नहीं ली। इस बेहतरीन और बेशकीमती परिसर की दुर्दशा हो चुकी है। कभी एक और कभी दूसरे संस्थान को सौंपे जाने से इसकी स्थिति फुटबॉल जैसी हो गई है। सारे भवन जर्जर हैं और इसका कोई भी उपयोग नहीं हो रहा है। 
-हिमांशु पांडे, ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख, भीमताल

पटवाडांगर स्थित पूर्व स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट की भूमि का यदि जीबी पंत विश्वविद्यालय अथवा जैव प्रौद्योगिकी परिषद के ओर से उपयोग नहीं किया जा सका हो तो राज्य सरकार को इसे वापस लेकर इसमें आधुनिक तकनीक से वैक्सीन बनाने की शुरुआत करनी चाहिए। वर्तमान में उतराखंड रैबीज के टीके हिमाचल प्रदेश से  मंगा रहा है, जबकि पूर्व में इसका उत्पादन पटवाडांगर में ही होता था। ऐसे बेशकीमती परिसर का निष्प्रयोज्य पड़ा होना दु:खद है। इसका सदुपयोग होना चाहिए।
- अजय भट्ट, सांसद नैनीताल-ऊधमसिंह नगर संसदीय क्षेत्र

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