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नदियों के किनारे कूड़ा प्रतिबंधित, राष्ट्रीय उद्यान प्लास्टिक फ्री जोन

Thu, 21 Dec 2017 10:05 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, नैनीताल
ब्यूरो / अमर उजाला, नैनीताल Updated Thu, 21 Dec 2017 10:05 AM IST
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nainital high court ban on riverbank garbage
nainital high court - फोटो : file photo

उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रदेश की मुख्य नदियों और उनकी सहायक नदियों के दोनों किनारों पर एक किलोमीटर के दायरे में कोई कूड़ा नहीं दिखना चाहिए। इसके लिए संबंधित जिलों के जिलाधिकारियों और उपजिलाधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार बताते हुए न्यायालय ने कूड़ा निस्तारण के लिए एक सप्ताह का समय दिया।

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इसी के साथ न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वन क्षेत्र में किसी भी तरह का कूड़ा डंप नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने राष्ट्रीय उद्यानों, वन्य जीव संरक्षण क्षेत्र आदि को प्लास्टिक फ्री जोन घोषित करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि इन क्षेत्रों में पर्यटक अधिकतम पानी की दो बोतलें लेकर ही जा सकते हैं।
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दिल्ली निवासी अजय गौतम की याचिका पर न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ में सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार ने शपथ पत्र पेश किया गया। शपथ पत्र में प्रदेश सरकार ने बताया कि बदरीनाथ, देवप्रयाग, ऋषिकेश, रुद्रप्रयाग का मास्टर प्लान तैयार कर लिया गया है। विकास प्राधिकरणों का मास्टर प्लान तीन साल में तैयार कर लिया जाएगा। इस मुद्दे को महत्वपूर्ण मानते हुए न्यायालय ने सरकार को छह माह में मास्टर प्लान तैयार करने का निर्देश दिया। केदारनाथ का योजना खाका भी छह माह में तैयार करना होगा।
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न्यायालय ने 19 नवंबर 2016 को इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान पर्यावरण, ग्लेशियर, नदियों आदि के संरक्षण के लिए आदेश जारी किए थे। न्यायालय ने बुधवार को इन्हीं निर्देशों के क्रम में प्रदेश सरकार को तीन माह में पर्यटन कोड विकसित करने और केंद्र को राज्य का सहयोग करने का निर्देश दिया। राज्य सरकार को छह माह के अंदर इको सेंसेटिव क्षेत्रों की भार वहन क्षमता का आकलन करने, तीन माह में चार धाम यात्रा रूट के सभी शहरों के सीवरेज ट्रीटमेंट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया।

न्यायालय ने यह भी कहा कि अगले तीन माह में चार धाम यात्रा मार्ग के अन्य शहरों की परियोजना रिपोर्ट तैयार कर नमामि गंगे के तहत केंद्र को भेजी जाए। न्यायालय ने 19 नवंबर 2016 को जारी निर्देशों के क्रम में प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल किए गए शपथ पत्र पर संतोष जताया और कहा कि आगे आने वाली पीढ़ी के लिए नदियों को निर्बाध बहते रहने देना होगा।

आपदा प्रबंधन पर भी गई निगाह
न्यायालय ने आपदा प्रबंधन के तहत प्रदेश में छह माह में तीन डाप्लर रडार स्थापित करने का निर्देश दिया। 2013 की केदारनाथ आपदा का जिक्र करते हुए न्यायालय ने प्रदेश सरकार को प्रत्येक  चार धाम यात्री का बीमा कराने और यात्रियों के पंजीकरण का पोर्टल छह माह में तैयार करने का निर्देश दिया।

वन्य जीवों के शिकार पर सख्त
न्यायालय ने राजाजी और कार्बेट पार्क में हाथियों और बाघों के शिकार को रोकने के लिए तीन माह के अंदर अधिकारियों केविशेष दल के गठन का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कोसी किनारे धनगढ़ी और ढिकुली सहित अन्य वन क्षेत्र से अतिक्रमण हटाएं और प्रभावितों का प्रभावी पुनर्वास करें।


यह कहा न्यायालय ने
यह हमारी संवैधानिक, विधिक, सामाजिक, नैतिक और पवित्र जिम्मेदारी है कि नदियों को मूल स्वरूप में बचाकर रखा जाए। नदियां जीवनदायिनी हैं। भविष्य की पीढ़ी के लिए नदी को प्रदूषण मुक्त और निर्बाध रूप से बहने देना चाहिए। हमे पानी का मूल्य समझना चाहिए।

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