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Lok Sabha Election 2024: दिग्गजों के उत्तराधिकारियों के लिए दिल्ली दूर, खुद चमके...लेकिन बेटे नहीं हो पाए सफल

Fri, 05 Apr 2024 04:26 PM IST
रेनू सकलानी राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Fri, 05 Apr 2024 04:26 PM IST
सार

लोस चुनाव में मानवेंद्र, ब्रहम दत्त, हरीश रावत, बहुगुणा और खंडूड़ी जैसे दिग्गज नेता खूब चमके, लेकिन दिग्गज नेताओं के रिश्तेदारों को लोस चुनाव में कामयाबी नहीं मिल पाई। 
 

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Lok Sabha Election 2024 Uttarakhand Successors of political stalwarts on parliamentary seats
पूर्व सीएम हरीश रावत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राज्य की संसदीय सीटों पर सियासी दिग्गजों के उत्तराधिकारियों के लिए दिल्ली दूर रही। दलों में परिवारवाद के प्रभाव और राजनीति की अनुकूल परिस्थितियों में भी वे हाथ लगे अवसर का लाभ नहीं उठा सके। ऐसे कुछ चेहरों को लोकसभा चुनाव में उतरने का मौका मिला, मगर उन्हें करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ सीटों पर बेशक विरासत की सियासत प्रभावी रही हो, मगर संसदीय चुनाव में जनता ने इसे खारिज कर दिया।

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दो बार टूटा नवप्रभात का सपनात
उत्तराखंड की राजनीति में नव प्रभात स्थापित नेताओं में से हैं। उन्हें राजनीति पिता ब्रहम दत्त से विरासत में मिली। ब्रहम दत्त कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में से थे। पिता के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जाने वाले नवप्रभात विधानसभा चुनाव भी जीते और प्रदेश की कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। लेकिन लोकसभा में जाने का सपना उनका पूरा नहीं हो सका। जबकि उनके पिता ब्रहम दत्त ने टिहरी लोकसभा का दो बार प्रतिनिधित्व किया। पहली बार वह 1984 में चुनाव जीते थे। दूसरी बार वह 1989 में जीते। लेकिन उनके सुपुत्र नव प्रभात ने दो बार चुनाव लड़ा और दोनों बार उन्हें हार मिली। 1996 में उन्हें अखिल भारतीय इंदिरा कांग्रेस(तिवारी) से चुनाव हारे। इस चुनाव में उन्हें 22 फीसदी से अधिक वोट मिले। 1998 लोस चुनाव में वह बसपा के टिकट पर लड़े और बुरी तरह से पराजित हुए। दूसरी बार उनका दिल्ली जाने का सपना टूट गया।
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राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं बन पाए मनुजेंद्र
लोकसभा के चुनावी इतिहास में मानवेंद्र शाह बड़ा नाम हैं। टिहरी लोकसभा सीट से मानवेंद्र शाह कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों से आठ बार सांसद रहे। मानवेंद्र शाह जब तक देश की संसद में टिहरी लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते रहे, तब तक उनके पुत्र मनुजेंद्र शाह राजनीति में एक गुमनाम चेहरा थे। मानवेंद्र शाह के निधन के बाद मनुजेंद्र राजपरिवार में पिता के उत्तराधिकारी तो बन गए, लेकिन राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर उन्हें मतदाताओं ने नहीं स्वीकारा। वर्ष 2007 में हुए उपचुनाव में भाजपा ने उन्हें चुनाव में उतारा लेकिन सहानुभूति की लहर के बावजूद मनुजेंद्र कांग्रेस के विजय बहुगुणा से हार गए।


 

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विजय बहुगुणा के बेटे साकेत भी हो गए नाकाम
2009 में लोस के चुनाव हुए तो भाजपा ने राजपरिवार से हट कर निशानेबाज जसपाल राणा को मैदान में उतारा। बहुगुणा फिर जीते। 2012 में जब वह मुख्यमंत्री बनें तो उन्हें सीट खाली करनी पड़ी। पिता ने अपनी यह सीट अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी साकेत बहुगुणा के लिए छोड़ दी। उपचुनाव में इस बार भाजपा ने फिर राजपरिवार से उम्मीदवार पर दांव लगाया। इस बार मनुजेंद्र शाह की जगह राजपरिवार की बहू मालाराज्य लक्ष्मी शाह चुनाव उतारी गईं। माला ने साकेत बहुगुणा को पराजित कर दिया। 2014 में पिता के राजनीतिक प्रभाव से उनके बेटे साकेत को फिर टिहरी सीट से चुनाव लड़ने का अवसर मिला। लेकिन साकेत नाकाम रहे।

 
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पिता की तरह नहीं  मिला मनीष खंडूड़ी जन समर्थन
गढ़वाल लोकसभा सीट पर पांच बार सांसद रहे पूर्व सीएम मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी के बेटे मनीष खंडूड़ी ने भी भाग्य आजमाया। लेकिन जनरल को जैसा जन समर्थन गढ़वाल से मिला, वैसा उनके बेटे को नहीं मिल पाया। खंडूड़ी के असली राजनीतिक उत्तराधिकारी उनके राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत बनें। 2019 के लोस चुनाव में जनरल के बेटे ने राजनीति में पर्दार्पण किया तो कांग्रेस के
उम्मीदवार के तौर पर। वृद्धावस्था में पहुंच चुके जनरल खंडूड़ी के लिए यह असहज करने वाली परिस्थितियां थीं। मनीष तीन लाख से अधिक वोटों से चुनाव हारे।

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वीरेंद्र के सामने मिथक तोड़ने की चुनौती
हरिद्वार लोकसभा पर कांग्रेस ने वीरेंद्र रावत को प्रत्याशी बनाया है। वीरेंद्र पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बेटे हैं। हरीश रावत ने उन्हें एक तरह से राजनीति उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है। अल्मोड़ा और हरिद्वार से सांसद रहे चुके हरीश रावत के परिवार से वीरेंद्र दूसरे सदस्य हैं, जिन्हें लोस चुनाव लड़ने का अवसर मिला है। इससे पूर्व 2014 में हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत हरिद्वार सीट से भाग्य आजमा चुकी हैं। लेकिन संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। अब बेटे वीरेंद्र के सामने इस मिथक को तोड़ने की चुनौती है कि उत्तराधिकारियों के लिए दिल्ली दूर रही है।
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