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लैंटाना का होगा नाश, विकसित होगी नई घास, वन अनुसंधान शाखा को मिले 11.15 लाख

Thu, 01 Aug 2019 03:27 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 01 Aug 2019 03:27 PM IST
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Lantana will be destroyed, forest research branch research
एफआरआई

टाइगर रिजर्व व अन्य अभ्यारण्यों में लैंटाना घास ‘लैंटाना कैमेरा’ की अधिकता पर्यावरण के साथ ही वन्यजीवों के लिए भी मुसीबत बन गई है। लैंटाना से निपटने के लिए वन विज्ञान अनुसंधान शाखा के वैज्ञानिक शोध में जुट गए हैं। वैज्ञानिक लैंटाना को समूल ‘जड़ से नष्ट करने के लिए’ नई घास विकसित करने पर शोध कर रहे हैं। इसके लिए अनुसंधान सलाहकार समिति की ओर से 11.15 लाख रुपये का बजट भी जारी किया गया है।

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वन संरक्षक व वन अनुसंधान शाखा के निदेशक संजीव चतुर्वेदी के अनुसार जिम कार्बेट व राजाजी टाइगर रिजर्व के अलावा वन्यजीव अभ्यारण्यों में लैंटाना की अधिकता से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर प्रभाव पड़ रहा है। लैंटाना के उन्मूलन को लेकर लगातार अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन इसके सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। ऐसे में अब उन प्रजातियों की घास व पौधों की खोजबीन की जा रही है। जिनके लगाने से लैंटाना का उन्मूलन हो जाए।
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इकोसिस्टम को भी बिगाड़ रही लैंटाना
वन संरक्षक का कहना है कि लैंटाना खतरनाक प्रजाति की झाड़ी है। यह खेतीबाड़ी को प्रभावित करने के साथ ही इकोसिस्टम को भी तहस नहस कर रही है। जंगलों में लैंटाना की अधिकता से जैव विविधता भी प्रभावित हो रही है। मार्च से लेकर अगस्त तक लैंटाना का विकास होता है। जून से अक्टूबर तक बीज निकलता है। लैंटाना की जड़ें जमीन के अंदर 30 सेमी नीचे तक जाती हैं ऐसे में इसे उखाड़ना भी आसान नहीं है।
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तेजपात, तिमला, खारिक, कचनार हो सकते हैं बेहतर विकल्प
वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक अब तक किए गए शोध में यह बात सामने आयी है कि तेजपात, खारिक, आंवला, रीठाए कचनार, सिरास, गिलोय व सर्पगंधा प्रजाति के पेड़ों को बहुतायत में वृक्षारोपण कर लैंटाना के असर को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही ऐसी प्रजातियों की झाड़ियों को खोजबीन की जा रही है जो लैंटाना का स्थान लें ले।


अभ्यारण्यों व जंगलों से लैंटाना को उखाड़ फेंकने व उसकी जगह लेने वाली घास की प्रजातियों को लेकर अध्ययन किया जा रहा है। इस संबंध में विस्तृत कार्ययोजना भी तैयार कर ली गई है। परियोजना छह साल में पूरी होगी। वैज्ञानिकों की टीम तमाम पहलुओं को लेकर अध्ययन कर रही है।
- संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक एवं निदेशक वन अनुसंधान शाखा

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