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रोजेदारों ने शुरू किया एतकाफ, मस्जिदों में मर्द और घरों में बैठती हैं औरतें
शादाब अली , अमर उजाला, पिरान कलियर
Updated Wed, 06 Jun 2018 02:22 PM IST
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- फोटो : file photo
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रमजानुल मुबारक के तीसरे अशरे के शुरू होते ही एतकाफ का अमल भी मंगलवार को 20वें रोजे की शाम से शुरू हो गया। उलमा के मुताबिक एक आदमी एतकाफ में बैठ जाए तो पूरी बस्ती का हक अदा हो जाता है। अल्लाह उस बस्ती पर आने वाले अजाबों को हटा लेते हैं।
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मौलवी जाकिर और मौलाना परवश ने बताया कि रमजान में नबी पाक ने पाबंदी के साथ एतकाफ किया। इसलिए इस अमल का बहुत ऊंचा दर्जा है। अल्लाह इंसान के सारे गुनाहों को माफ कर देते हैं और नेकियों में इजाफा होता है। एतकाफ में बैठने वाले को दो हज और एक उमरे का सवाब मिलता है। मंगलवार को सूर्यास्त के बाद मर्द मस्जिदों और औरतें घरों में एतकाफ में बैठ गई। ईद का चांद दिखाई देने पर एतकाफ पूरा होगा।
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क्या है एतकाफ
इसमें व्यक्ति मसजिद के एक कोने में पर्दा लगा अल्लाह की इबादत करता है। दस दिनों तक वह उठते, बैठते, खाते पीते और यहां तक कि सोते हुए भी 24 घंटे इबादत में मश्गूल रहता है। एतकाफ में व्यक्ति कुरान पाक की तिलावत करता है, नफिल नमाजें अदा करता और तस्बीह पढ़ता है। किसी से मिलता-जुलता नहीं है।
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ये हैं एतकाफ की शर्तेें
- एतकाफ में बैठने वाला मोमिन रोजा जरूर रखें।
- समझ दुरुस्त होना। पागल और सूझबूझ दुरुस्त न रखने वाला इंसान नीयत नहीं कर सकता।
- मसजिद के अलावा मर्दों का एतकाफ कहीं और जायज नहीं है।
- शरीर का पाक होना। नापाकी की हालत में मसजिद में ठहरना जायज नहीं है।
- किसी महिला के एतकाफ में बैठने के लिए शौहर की इजाजत जरूरी है।
इनसे टूटता है एतकाफ
- बिना वजह मस्जिद से बाहर निकलना
- नशीली चीज खानें से बुद्धि खो देना या पागल हो जाना
- एतकाफ की नीयत खत्म कर देना
जहन्नुम से निजात का तीसरा अशरा शुरू
जहन्नुम से निजात का तीसरा अशरा मंगलवार शाम से शुरू हो गया। उलमा के मुताबिक तीसरे अशरे में खुदा की इबादत करने वालों को जहन्नुम की आग से मुक्ति मिलती है। मौलाना परवश और मौलवी जाकिर ने बताया कि रमजान का पूरा महीना ही रहमतों का महीना है। लेकिन सबसे अहम है तीसरा अशरा। क्योंकि इसी अशरे की पाक रातों में यानी 21, 23, 25, 27, 29 रमजान की रात पाक कुरान शरीफ नाजिल हुई थी। इन रातों में से जिस रात को कुरान शरीफ नाजिल हुई, उसे शबे कद्र की रात कहते हैं। इसलिए इन रातों की अहमियत काफी बढ़ जाती है। शबे कद्र की रात को हजार महीने की रातों के बराबर बताया गया है। लेकिन वह कौन सी रात है, किस रात को कुरान शरीफ नाजिल हुई, यह ठीक-ठीक मालूम नहीं है। इसलिए रोजेदार इन पांचों रात को जागकर खुदावंद करीम की इबादत करते हैं। रमजान के तीसरे अशरे में ही हम फितरा और जकात भी निकालते हैं, जिससे ईद की नमाज गरीब लोग भी खुशी से पढ़ सकें।