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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Independence Day 2021: spirit and enthusiasm of youth in this freedom fighter even at the age of 103 years

स्वतंत्रता दिवस 2021: इस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी में 103 साल की उम्र में भी युवाओं जैसा जज्बा और जोश

Sat, 14 Aug 2021 03:15 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal चंद्रमोहन शुक्ला, अमर उजाला, कोटद्वार
चंद्रमोहन शुक्ला, अमर उजाला, कोटद्वार Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 14 Aug 2021 03:15 PM IST
सार

10 अक्तूबर, 1919 को पौड़ी के मल्ला ढांगू (वर्तमान में द्वारीखाल ब्लाक) के खैंडूड़ी गांव में जन्मे मुरली सिंह रावत बताते हैं कि 18 वर्ष की आयु में 1937 में वह आर्मी ट्रेनिंग स्कूल लैंसडौन में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हो गए। तीन साल बटालियन में रहने के बाद लॉस नायक के पद पर प्रोन्नत हुए।

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Independence Day 2021: spirit and enthusiasm of youth in this freedom fighter even at the age of 103 years
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मुरली सिंह रावत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड में पौड़ी जिले के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मुरली सिंह रावत 103 की उम्र में भी युवाओं जैसा जोश रखते हैं।

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कोटद्वार भाबर के मवाकोट गांव में स्थित उनके आवास पर उनसे मुलाकात हुई तो उनका जज्बा और जोश देखने लायक था। शतकवीर स्वतंत्रता सेनानी से जैसे ही उनके संघर्ष पर बात हुई, वह जोश से भर गए। उनका कहना था कि देश को आजादी कोई आसानी से हासिल नहीं हुई। हजारों बलिदान और कड़े संघर्ष से आजादी मिली है। 
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10 अक्तूबर, 1919 को पौड़ी के मल्ला ढांगू (वर्तमान में द्वारीखाल ब्लाक) के खैंडूड़ी गांव में जन्मे मुरली सिंह रावत बताते हैं कि 18 वर्ष की आयु में 1937 में वह आर्मी ट्रेनिंग स्कूल लैंसडौन में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हो गए। तीन साल बटालियन में रहने के बाद लॉस नायक के पद पर प्रोन्नत हुए।

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इसके बाद उन्हें सिंगापुर जाने का आदेश मिला। वहां दिसंबर, 1941 में रहे। यहां जापान ने अंग्रेजी फौज पर अचानक हमला कर दिया था, जिसके कारण अंग्रेजी फौज को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इसके बाद कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज (आईएनए) का गठन हुआ।

मोहन सिंह और रासबिहारी बोस में मतभेद पनपने लगे तो इसी बीच नेताजी सुभाष चंद्र बोस आईएनए को संभालने के लिए जर्मनी से सिंगापुर पहुंचे। इसके बाद नेताजी के नेतृत्व में संघर्ष शुरू हुआ। उन्हें कई दिन रंगून जेल में भी रहना पड़ा।

सरकार अच्छी पेंशन दे रही है, कोई गिला शिकवा नहीं

अंग्रेजों की उनपर कड़ी निगरानी रही, लेकिन जेल से छूटने के बाद वह पानी के जहाज से कलकत्ता पहुंच गए। यहां भी अंग्रेजों की नजर से नहीं बचे तो फिर से जेल जाना पड़ा। इस पूरी समयावधि में घर वालों को उनके जीने मरने की कोई खबर नहीं रही। सात साल बाद जब घर लौटे तो घरवालों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वर्तमान में वह अपने दो बेटों के भरे पूरे परिवार के साथ जीवन जी रहे हैं। संवाद

स्वतंत्रता सेनानी मुरली सिंह रावत कहते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार से अच्छी पेंशन मिल रही है। कोई गिला शिकवा नहीं है। वह युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं कि जब भी देश को जरूरत पड़े, देश के काम आएं। देश से बड़ा कुछ नहीं है। उनके पौत्र चंद्रमोहन सिंह बताते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में उनके दादा मुरली सिंह भी कोरोना की चपेट में आ गए थे।

डाक्टरों की सलाह पर उन्हें होम आइसोलेट रखा गया। 103 साल की उम्र में उन्होंने कोरोना को भी मात दे दी। आईएनए के संघर्ष से जुड़े दस्तावेज भी उन्होंने संभालकर रखे हुए हैं, जो भी उनसे मिलने घर पहुंचता है वह बड़े स्नेह से सभी से मिलते हैं। 

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