IIT रुड़की का दावा, इस तरह आपदा के समय हो सकता है 90 प्रतिशत तक बचाव

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विनोद कुमार सिंह/ अमर उजाला, रुड़की Published by: Updated Wed, 19 Jul 2017 08:56 AM IST
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पहाड़ों में आवास आदि निर्माण के लिए फिलहाल कोई मानक निर्धारित नहीं हैं। धड़ल्ले से मनमाने तरीके से निर्माण किए जा रहे हैं। न आमजन इसकी प्रति सचेत हैं और न सरकार इसके प्रति चिंतित है।
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आने वाले समय में यह लापरवाही खतरे का सबब बन सकती है। इसी को देखते हुए आईआईटी वैज्ञानिक अध्ययन कर पहाड़ों में निर्माण के लिए आइएस-कोड निर्धारण को जरूरी बता रहे हैं। इनका दावा है कि मानक निर्धारण से आपदा के समय 90 फीसदी बचाव संभव है।


सिक्किम में 18 सितंबर 2011 को आए भूकंप में भवनों को भारी क्षति पहुंची थी। इसे देखते हुए आईआईटी रुड़की ने पहाड़ों में आईएस कोड निर्धारण की कवायद शुरू की है। इससे पहले भवनों के लिए आईएस-1893-2016 कोड का निर्धारण किया है, लेकिन यह सिर्फ मैदानी क्षेत्रों के लिए है। आज भी पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण के लिए कोई मानक निर्धारित नहीं किए गए हैं। जिसकी वजह से पहाड़ों में लगातार मनमाने तरीके निर्माण लगातार चल रहे हैं। जबकि पहाड़ों में मैदानों की अपेक्षा भूकंप का खतरा अधिक रहता है।

यही नहीं पहाड़ों में जैसे-जैसे भवनों की ऊंचाई बढ़ती जाती है उसकी संवेदनशीलता कई गुना बढ़ जाती है। आईआईटी वैज्ञानिकों का मानना है कि पहाड़ों में गुणवत्तापरक मैटेरियल का अभाव होता है। साथ ही नींव भी एक समान न होकर एक ही भवन में अलग-अलग ऊंचाई पर होती है। वहीं बढ़ती जनसंख्या और सीमित भूमि के कारण पहाड़ों में लगातार मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाई जा रही हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह खतरे का सबब बन सकती है।
 
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बढ़ते खतरे को देखते हुए पहाड़ी राज्यों में बने भवनों का सर्वे

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