हिमालय दिवस 2019: हिमालयी मुद्दों और संरक्षण को लेकर गंभीर नहीं सरकार, पढ़ें ये खास रिपोर्ट...
ग्लेशियर पिघल रहे हैं, नदियां कुम्हला रहीं हैं, धाराएं सूख रहीं हैं, बाघ, भालू आक्रामक हो रहे हैं, बारिश अब वक्त पर नहीं होती। हिमालय के साथ करोड़ों सालों से सह अस्तित्व का तंत्र जैसे टूट रहा है। यह सब शायद इसलिए कि हम अपनी मुठ्ठी में क्षमता से अधिक भरना चाहते हैं। हमें समझना होगा कि हिमालय में सिर्फ भूकंप की ही हलचल नहीं होती। नए पहाड़ नए संकेत दे रहे हैं। इन संकेतों के निहितार्थ समझने की भी जरूरत है।
नौ सितंबर को हिमालय दिवस के परिप्रेक्ष्य में यह सिरीज इन्हीं संकेतों को दर्ज करने और सबको साथ लेकर एक राह की तलाश करने की है। इसमें हम हिमालय के विभिन्न पहलुओं से परिचित होंगे, विशेषज्ञों से बात कर निहितार्थ समझेंगे और आपसे साझा करेंगे। इसी कड़ी में हमारे मुख्य संवाददाता सुधाकर भट्ट की पर्यावरणविद् और हेस्को के निदेशक पद्मश्री डॉ. अनिल जोशी से बातचीत के मुख्य अंश पेश हैं।
राजनीतिक स्तर पर हिमालय संरक्षण की चेतना को किस स्तर पर पाते हैं आप?
हिमालयी मुद्दों और संरक्षण को लेकर सरकारें कभी गंभीर नहीं रहीं। अमेजन के जंगल में आग लगती है तो शोर उठता है कि दुनिया को 20 प्रतिशत आक्सीजन देने वाले जंगल जल रहे हैं। हिमालय जो हर साल करोड़ों लोगों को बाढ़ से बचाते हैं, आक्सीजन देते हैं वहां जंगलों में आग लगती है तो कोई सरकार कुछ नहीं कहती। मुसीबत यही है कि हिमालय के योगदान को कभी किसी ने स्वीकार ही नहीं किया।
हिमालय को बिना नुकसान पहुंचाए, विकास का कैसा मॉडल होना चाहिए?
हमें उपभोग, उपयोग और संरक्षण के आपसी संबंध को समझना होगा। यह समझ और आदत विकसित करनी होगी कि उपभोग (कंज्यूम) कितना किया जाए, उपयोग का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्या हो और संरक्षण किस तरह से और कहां किया जाए। व्यवहारिक स्तर पर देखिए, हिमाचल प्रदेश 15 हजार करोड़ रुपये की आय कृषि एवं बागवानी से कर रहा है। उत्तराखंड सरकार औद्योगिक समिट से लेकर न जाने किस तरह के समिट आयोजित कर रही है। सरकार को चाहिए अब ग्रामीण समिट आयोजित करे। गांवों में निवेश हो।
तो इस स्तर पर आगे क्या किया जा सकता है?
हमारी सबसे बड़ी गलती यह हुई कि हम सरकारों को समय से चेता नहीं पाए। हिमालय सामूहिक सहयोग की भावना चाहता है। हमें स्वीकार करना चाहिए कि राजनीतिक हिस्सा भी महत्वपूर्ण है। हिमालय की गोद में पल बढ़ रहे लोगों ने एक समझ विकसित की है। बदलते दौर में उनके कई प्रयोग हैं। हेस्को ने सिर्फ वैज्ञानिक समझ और सभी का सहयोग लेकर पूरा एक जंगल विकसित किया, एक नदी को पुनर्जीवित किया। जरूरत है कि लोगाें के सफल प्रयोगों से केंद्र और राज्यों कोे अवगत कराया जाए। मैं तो कहता हूं, आइए, देखिए, हमने क्या किया, कैसे किया, सवाल पूछिए, जवाब हम देंगे।
हिमालय की बात प्रमुखता से हिमालयी राज्यों के लोग ही उठाएंगे। आपका क्या कहना है?
पर्यावरणीय सेवाओं के आकलन से भी साफ हुआ है कि हिमालय की ओर से दी जा रही पर्यावरणीय सेवाओं के 10 प्रतिशत का उपयोग ही राज्य कर रहा है। पानी से लेकर अन्य सेवाओं के 90 प्रतिशत का उपयोग अन्य लोग करते हैं। मैदानी क्षेत्र के लोगों को भी आगे आना चाहिए। आखिर भारत की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसी हिमालय की कृपा से जिंदा है।
नौ वर्षों से हिमालय दिवस मनाया जा रहा है। फिर भी लगता है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अब भावी रणनीति क्या होनी चाहिए ?
हिमालय के संरक्षण के प्रति जागरूकता के साथ ही अब जरूरत है कि हम हिमालय के विज्ञान को समझे। इसका रोडमैप बनना चाहिए। इकहरी दृष्टि नहीं चलेगी। समूची पारिस्थितिकी को समझना होगा। इस बार हिमालय दिवस की हमारी थीम भी यही है। पूर्व में योजना आयोग की पहल पर हिमालय का अध्ययन करने के लिए बनी माउंटेन टास्क फोर्स ने अपनी खोज में पाया था कि हिमालय के बारे में हमारी जानकारी राई के ढेर में सुईं जितनी भी नहीं है। हमें हिमालय के साथ सह अस्तित्व में रह रहे लोगों से भी बात करनी होगी, आधुनिक ज्ञान का उपयोग, उपभोग नहीं बल्कि संरक्षण की दृष्टि से करना होगा। हमें एक समाज के रूप में खुद को भी समझना होगा और इसी परिप्रेक्ष्य में हम समझ पाएंगे कि हिमालय की इस समय मांग क्या है।
विकास की आकांक्षा और संरक्षण में परस्पर विरोध है क्या?
हमें यह समझना होगा कि दुनिया में हमी पहाड़ नहीं हैं। यूरोप मेें सड़क बनतीं हैं तो पहले इकोलॉजी के हिसाब से रोड मैप बनता है। चीन जिसकी हम इतनी बात करते हैं, वह तक किसी विकास योजना को अंजाम देते समय पारिस्थितिकी के मानक सामने रखता है। दरअसल हमारे यहां दो छोर हैं। एक छोर पर बैठी सरकार विकास की बात करती है तो पारिस्थितिकी तंत्र की उपेक्षा कर देती है। संरक्षण की बात करने वालों को तुरंत विकास विरोधी करार दिया जाता है। सरकारों को समझना चाहिए कि सतत विकास तभी होगा, जब मूल में संरक्षण की भावना हो। दूसरा छोर संरक्षण की बात करने वालों का हैं, जिन्हें समझाना होगा कि संरक्षण के केंद्र में मानव है।
कितना कुछ दे रहें हैं हिमालय
यह आकलन सिर्फ उत्तराखंड के लिए ही है। इतना होने पर भी प्रदेश में हिमालय का यह हिस्सा भर मानव आबादी को 95 हजार करोड़ से अधिक की पर्यावरणीय सेवा हवा, पानी, आजीविका, ईंधन, मिट्टी आदि के रूप में देता है। यह तब है जब हिमालय की जैव विविधता, वन्य जीव और अन्य पारिस्थितिकी तंत्रों का आंकलन नहीं किया गया है।
कितना कुछ सहेजे हुए है हिमालय
लकड़ी का मूल्य 721101 करोड़ रुपये
कार्बन स्टॉक मूल्य 255725 करोड़ रुपये
वन भूमि का मूल्य 436849 करोड़ रुपये
कुल स्टॉक मूल्य 1413676 करोड़ रुपये
हिमालय नहीं तो पानी भी नहीं
सिर्फ उत्तराखंड के जंगलाें का मूल्यांकन भर बता रहा है कि पानी के लिए भी जंगलों का होना जरूरी है। उत्तराखंड के जंगल साल भर में 655 करोड़ रुपये के मूल्य के जल का शोधन करते हैं। इतना ही नहीं वर्षभर में यही जंगल मानव आबादी को 745 करोड़ रुपये मूल्य का पानी उपलब्ध कराते हैं। यहीं जंगल हैं जो मैदानी क्षेत्रों को हर साल बाढ़ से होने वाले करीब 540 करोड़ रुपये के नुकसान से बचाते हैं। हिमालय अपने गोद में इन जंगलों को समेट कर न रखे तो हर साल करोड़ों रुपये सिर्फ बाढ़ की प्रकोप से निपटने में खर्च हो जाएं।